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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



मैं नए गीत बुन रही हूँ!

सरस्वती माथुर


समय की पदचाप सुन रही हूँ मैं नए गीत बुन रही हूँ झरने सा शब्दों को झरने देती हूँ बंजारे से डोलते विचारों को मिलने देती हूँ छिलके उतार मन अभिव्यक्ति के मैं फूलों से रंग चुन रही हूँ अब नए गीत बुन रही हूँ अब पहचान लेती हूँ अपनो को पिरो कर छोटे छोटे सपनो को रिश्तों की माला में पिरो कर प्रीत की रौशनी से सिल रही हूँ मैं अब नए गीत बुन रही हूँ अपने को पाने की धुन में कुछ पलों को सृजित कर पंख उगा उड़ जाने का मन है इसलिए चिड़ियाँ से उधार ले मैं नया गीत गुन रही हूँ अ अब गीत नए गुन रही हूँ अब नए गीत बुन रही हूँ सृज़न के वीणा से तारों को भावनाओं से गुन रही हूँ मांग कर सृज़न भरे स्वर मैं गीत नया बुन रही हूँ
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