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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



अस्थियों के जंगल में

डॉ०अनिल चड्डा


अस्थियों के जंगल में, भटकी हैं, संवेदना की तितलियां ! यंत्र - चालित से ह्रदय हैं, पानी से भरी धमनियां !! भावना है व्यर्थ यहां, सब का अर्थ है, अर्थ यहां, बस माया ही अर्धय यहां, सब दे के मिले दर्द यहां, स्वार्थ की ये नगरी है, यहां मिलती, पैसों से ही खुशियां ! यंत्र - चालित से ह्रदय हैं, पानी से भरी धमनियां !! पत्थर के बुत हैं सब, अपने ही मद में धुत हैं सब, यूं है शोर चारों और, मन ही मन में चुप हैं सब, ये उदास नगरी है, यहां तकती हैं, भाव-शून्य पुतलियां ! यंत्र - चालित से ह्रदय हैं, पानी से भरी धमनियां !!
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