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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



ग़ज़ल - ज़िन्दगी में वही सिलसिला छोड़कर

सुनील कुमार लोहमरोड़ ‘सोनू’


ज़िन्दगी में वही सिलसिला छोड़कर वो चला गया मुझे डूबता छोड़कर। आरजू थी कि चाहा न जाये उसे आ गए हम भी उसको ख़फा छोड़कर। 1। अब खुदा जाने कैसे निभेगी वफ़ा बैठते हैं अब वो फासला छोड़कर। 2। वो परिन्दा मिरा कैसे होगा अब खुदा जो उड़ गया कहीं घर मेरा छोड़कर। 3। सुलह कर लेता है वो हर दफा सनम जा चूका जो मुझे बहुत दफा छोड़कर। 4। बेशक चला जा दूर मुझसे तू मगर मत जाना बाकि कुछ अनकहा छोड़कर। 5। समय पर कर लिया कर गिला हो अगर फिर कहोगे चल बसा गिला छोड़कर। 6। ये बड़ा गज़ब का दस्तूर है ‘सोनू’ यहाँ सब दिखे है बस खुद की खता छोड़कर। 7।
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