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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



गज़ल - ये अम्बर पे छाई जो काली घटाएँ

मंजीत कौर "मीत"


ये अम्बर पे छाई जो काली घटाएँ घड़ी दो घड़ी की हैं मचली हवाएँ इबादत सी होतीं हैं मानो अगर तुम है करती असर दिल से निकली दुआएँ नसीबों का खेला ये हमने है माना किसी को है उल्फ़त किसी को जफ़ाएँ मुहब्बत की बातें वो उल्फ़त के किस्से हो जाती ख़बर लाख इसको छिपाएँ अगर लाख कोशिश भी तुम जो करोगे करेंगी ये पीछा हमारी सदाएँ बुझाते रहे हैं सितमगर हमेशा मगर "मीत"जलती मुहब्बत शमाएँ |
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