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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



ग़ज़ल - वही जुबां इधर है, वही जुबां उधर है

डॉ० अनिल चड्डा


वही जुबां इधर है, वही जुबां उधर है, समझ नहीं आ रहा, इंसानियत किधर है । जिन्दगी उलझा दीजिये, जिन्दगी सुलझाने में, कोई भी रास्ता करो, अंत में तो कबर है । कुछ है नहीं जिस पर कभी सर उठायें फख्र से, वो चाह ले तो रात है, वो चाहे तो सहर है । मुमकिन अगर होता कि तेरे दिल में क्या है जान लें, तुझे लगता नहीं पता कभी, हमको सारी खबर है । अनजाने से जब लोग मिल जाते हमें किसी राह पर, हम भूल जाते हैं कि ये तो हमारा शहर है ।
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