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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



ग़ज़ल - मन का गुब्बार निकल जाये तो कुछ बात करें

डॉ० अनिल चड्डा


मन का गुब्बार निकल जाये तो कुछ बात करें, हम पर ऐतबार जो हो जाये तो कुछ बात करें । घर के दालान में खड़ी की थीं जो तुमने दीवारें, ग़र इक ईंट ही गिराओ तो कुछ बात करें । दूरीयाँ बना कर भी कभी किसी से प्यार फले, थोड़ा नज़दीक जो आओ तो कुछ बात करें । दवा कौन सी दूँ मैं तुझे तेरी बीमारी की, अपना जो मर्ज़ बताओ तो कुछ बात करें
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