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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



ग़ज़ल - हमारी साफगोई को दिल्लगी समझ लिया

डॉ० अनिल चड्डा


हमारी साफगोई को दिल्लगी समझ लिया, सर हमने झुकाया, तो बंदगी समझ लिया । जुबां बंद ही रहती, ग़र तुम शुरुआत न करते, हमारी चूप्पी को क्यों शर्मिंदगी समझ लिया । जिम्मेदार तो तुम्ही थे हमारी बर्बादी के, हमने तो इसे ही है जिन्दगी समझ लिया । ‘अनिल’ के ग़म कम न थे, न कम होंगे कभी, मेरे आँसुओं को तुमने अदायगी समझ लिया । [1222]
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