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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



ग़ज़ल - अब सलामत हमें अपना घर चाहिए

अनंत आलोक


अब सलामत हमें अपना घर चाहिए | आँख जो भी उठाये वो सर चाहिए || ** बंद कर दो सभी जंगो जेहाद तुम | इक मुहब्बत का बसना शहर चाहिए || ** अब न लस्सी न मक्खन न दूधो दही | नाश्ते में परोंठा बटर चाहिए || ** चाहते हो किसी का जो हम गम हुआ | दिल में दरिया दिली आँख तर चाहिए || ** चाहती है अगर भिन्न मिश्रित हुआ | जीस्त में अंश जैसा ही हर चाहिए || ** कर दुआ बागे उल्फत ये आबाद हो | दीद तेरा ही शामो सहर चाहिए ||
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