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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 98,दिसम्बर(प्रथम), 2020

पेंशनर

मुरलीधर वैष्णव

उसे रिटायर हुए कोई पांच महिने बीत गये थे। अभी तक पेंशन ग्रेच्युअटी आदि के नाम पर उसे एक धेला भी नहीं मिला था। अब तक की गई छोटी मोटी बचत भी घर खर्च में काम आ गई थी। इधर बेटी की शादी तय हो गई वह अलग। उसका धैर्य चुकने लगा था।

इधर सरकार ने आदेश जारी करने में कुछ महिनों की देरी कर दी तो उधर संबधित बैंक में सरकारी आदेश प्राप्त हो जाने पर भी उसे पेंशन तक नहीं मिल रही थी। पेंशन ग्रेच्युअटी आदि मिला कर कोई बारह लाख रूपयें की रकम बैंक ने रोक रखी थी।

’’आप मेरी बकाया रकम क्यों नही दे रहे हैं ? आखिर क्या चाहते है आप ?’’ एक दिन वह बैंक-मैनेजर से भिड़ ही पड़ा।

’’देखिये, बडी रकम का मामला है। सरकारी आदेशों का सत्यापन हमारे हेड-ऑफिस से होता है। मामला अभी प्रोसेस में है। हो जायगा चार पांच दिनों में।’’ मैनेजर ने उसे शांत करना चाहा।

चार पांच दिनों की जगह दस दिन बीत गये। इस बार वह दनदनाता हुआ बैंक मैनेजर के कक्ष में घुसा। उसकी आंखों से अंगारें बरस रहे थे। उसने बिना कुछ बोले अपनी पास बुक बैंक मैनेजर के सामने रख दी। बैंक मैनेजर ने उसकी ओर देखा और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसने अपने हाथ का काम छोड़कर पहले उसके पेंशन खाते का विवरण कम्प्युटर पर देखा।

’’आपके पेंशन आदि आदेशों का सत्यापन तो हो चुका है। लेकिन एक प्रोब्लम है।’’

’’अब क्या?’’

’’आप गत इकतीस अक्टूबर को रिटायर हुए थे। ओह! क्या मनहूस तारीख है! आप तो जानते हैं उस दिन इंदिरा गांधी की...खैर, बात यह है कि हर नवम्बर में पेंशनर को अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र देना होता है। आपने नहीं दिया। इसलिए, रकम-भुगतान पर उपर से रोक लगी हुई है। सॉरी...‘‘

’’क्या ? अब आपको मेरे जीवित होने का प्रमाण चाहिये? पिछले पांच महिनों से आप ही के बैंक से मेरे बचत खाते में जमा मामूली पूंजी में से घर खर्च के लिए थोड़ी थोड़ी रकम मैं उठाता रहा हूं। और आज फरवरी में आप मुझे कह रहे हैं कि मैं गत नवंबर में जीवित था या नहीं?

’’अब यह तो नियम की बात है। आप अभी प्रमाण पत्र दे दीजिए तीन चार दिनों में आपका भुगतान क्लियर हो जायगा।’’

पेंशनर का माथा भन्ना उठा। उसने अपने थैले में से अचानक पिस्तोल निकाली और अपनी कनपटी पर रखते हुए बोला-

’’मैं आपको अपने जीवित होने का प्रमाण-पत्र अभी देता हूं। सिर्फ पन्द्रह मिनट है, आपके और मेरे पास, मिस्टर मैनेजर! ...ठीक तीन बजकर पन्द्रह मिनट बाद मेरी लाश यहां पड़ी मिलेगी और आपको प्रमाण पत्र मिल जायगा कि पन्द्रह मिनट पहले तक मैं यहां जीवित था।’’

’’रूको रूको भाई! ऐसा मत करो, मै अभी कुछ करता हूं’’ मैनेजर ने कांपते हाथों से तुंरत फोन लगा कर अपने हेड-आफिस बात की। अपने बॉस से टेलिफोनिक अप्रुवल लेकर उसने तुरंत ही उस पेंशनर के बैंक-खाते में उसकी बकाया रकम बारह लाख रुपये क्रेडिट कर दिये।

’’अब तो ठीक है। बस, इस फार्म पर आप दस्तखत कर दें।’’ पेंशनर को उसकी पास बुक थमाते हुए मैनेजर के हाथ अभी भी कांप रहे थे।

’’यह आपके बच्चेां के काम आएगी’’ पेंशनर ने फार्म पर दस्तखत करने के बाद मैनेजर की टेबल पर पिस्तोल रखते हुए कहा। वह एक ब्रांडेड कंपनी की खिलौना-पिस्तोल थी।


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