मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 91,अगस्त(द्वितीय), 2020

दहेज एक:रूप अनेक

डॉ आर बी भण्डारकर

विवाह योग्य बेटी के लिए वर तो ढूढ़ना ही है।कार्य की व्यस्तता,छुट्टियाँ मिलने की मुश्किल; पर आज निकल ही पड़े हैं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक इंद्रेश्वर एक मंजिल की ओर।

गंतव्य पर पहुँचते ही लड़के के पिता बुद्धलाल बाहर ही मिल गए।इंद्रेश्वर ने अपना परिचय दिया तो उन्होंने जोर से सलाम ठोका,फिर "जय हिंद सर " किया।

"अरे नहीं भाई व्यक्तिगत भेंट में सरकारी प्रोटोकॉल आवश्यक नहीं बुद्धलाल जी।"

"जी सर ! आदेश ?"

"नहीं भाई आदेश नहीं।.....दर असल बात यह है कि मेरी बेटी ने इसी वर्ष कम्प्यूटर से बी ई किया है।मेरे एक रिश्तेदार ने बताया है कि आपका बेटा एम बी बी एस करके अब जूनियर रेजिडेंट है ; मैं इसी सिलसिले में आया हूँ।"

बुद्धलाल की मुखमुद्रा बदल गयी।.....जी तोss ?... कहिएss ?

"तो क्या आप उपयुक्त प्रस्ताव मिलने पर अपने बालक की शादी करना चाहते हैं ?"

"बिल्कुल करना चाहता हूँ।"

"लड़की मेडीकल क्षेत्र की ही चाहिए या फिर कोई भी उपयुक्त लड़की ?"

"लड़की का मेडीकल लाइन का होना जरूरी नहीं।घर-परिवार अच्छा हो,लड़की सुंदर और संस्कारवान होनी चाहिए।"

" मुझे बताया गया है कि लड़का जे आर के बाद पी जी की पढ़ाई करना चाहता है।"

"सही सुना है ; वह इसके बाद पी जी ही करेगा।"

"बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ? "

"जी कहिएs ?"

"लड़का भी पढ़ाई जारी रखना चाहता है, आप भी लड़के की पढ़ाई जारी रखने के पक्ष में हैं; तो अभी उसकी शादी क्यों कर रहे हैं।पहले पढ़ाई पूरी हो जाने दें।"

" देखिए साहब ! मैं सिपाही आदमी।कब तक खर्च उठाऊँगा।शादी करके जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहता हूँ।शादी के बाद वह (पुत्र) जानें और शादी करने वाला(लड़की का पिता) जाने कि वह पीजी कैसे करेगा ।

आश्चर्य चकित इंद्रेश्वर अब ,बुद्धलाल का मुँह ताक रहे थे।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें