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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 91,अगस्त(द्वितीय), 2020

भरी कलाई भीगी पलकें

दिलीप भाटिया

कैलाश माइग्रेन के इलाज के लिए जयपुर दुर्लभ जी अस्पताल में भर्ती था। सुबह नर्स इंजेक्शन लगाते समय मरीज को उदास देखकर कारण पूछा। सिस्टर आज रक्षा बंधन है ना। बहन का लिफाफा तो रावतभाटा में घर पर आया होगा। पर आज मेरी कलाई तो सूनी ही रह जाएगी। नर्स बोली - हम इंजेक्शन लगा कर सुई चुभाती हैं तो भी आप मुस्कराकर थैंक यू सिस्टर बोलते हैं। हम सिस्टर्स के होते आपकी कलाई सूनी रहने ही नहीं देंगे। कोई भी सिस्टर आप जैसा भाई पाकर धन्य हो जाएगी। दिन भर सिस्टर्स आकर कैलाश की कलाई पर राखी सजाती रहीं एवम् अनोखी राखी की याद के लिए सेल्फी भी लेती रहीं। शाम एवम् रात्रि शिफ्ट वाली सिस्टर्स भी आती रहीं। भैया हम चार्ज देते समय यह भी बताती रहीं की दस नंबर वाले मरीज की कलाई भरी रहे। कैलाश की कलाई सिस्टर्स की राखियों से भरी हुई थी एवम् पलकें निस्वार्थ स्नेह भरे प्यार से भीगी हुई थीं।


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