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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

मीठी यादों के सहारे

पवनेश ठकुराठी 'पवन'

"देखती नहीं क्या ? कितना काम है अभी मेरा ! खाना-खा, खाना खा ! जा खा ले ना तू। हर वक्त बक-बक !"-अविनाश ने झल्लाते हुए नेहा से कहा।

नेहा के आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने तो यही सोचकर उनसे खाने के लिए कहा कि आफिस से थककर आये होंगे। भूख लगी होगी। बस इतनी-सी बात पर भी डांट-फटकार। वह दौड़ती हुई छत पर जा पहुंची। उसे अतीत याद आने लगा। तीन साल पहले ही तो उन दोनों की शादी हुई थी। अपनी मर्जी से घरवालों को मनाकर दोनों ने प्रेम विवाह किया था।

शादी के दो साल बाद ही अविनाश इतने बदल जायेंगे। नेहा ने सपने में भी नहीं सोचा था। क्या ये वही अविनाश हैं, जो शादी से पहले मुझसे कहा करते थे- "मैं सारे कष्ट सह लूंगा, लेकिन तुम्हारे आंखों में कभी आंसू नहीं आने दूंगा।" पता नहीं अब वह कभी पुरानी जिंदगी को दुबारा जी भी पायेगी या फिर उसे अतीत की मीठी यादों के सहारे ही जीना होगा ?

वह इसी उधेड़बुन में थी कि नीचे से आवाज आई- "नेहा, ओ नेहा ! कहाँ चली गई ! खाना लगा तो भूख लगी है..।" वह तेजी से छत की सीढ़ियों से नीचे उतर गई।


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