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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

गुल्ली-डंडा

पवनेश ठकुराठी 'पवन'

जीतू चचा और मदनी बूबू बातचीत कर रहे थे। जीतू चचा- "ताऊ, आजकल के जमाने में अब कौन खेलता है गुल्ली-डंडा ? बच्चे से बूढ़े तक सब क्रिकेट में मगन हैं। किसे फुरसत है गुल्ली-डंडा खेलने की ?"

मदनी बूबू तैस में आ जाते हैं- "नहीं खेलते हैं यार आजकल के जमाने में गुल्ली-डंडा ! नेता और जनता खेलते हैं। नेता लोग डंडा पकड़कर जनता को पदाते हैं और जनता पदती है। हर पांच साल में गुल्ली-डंडे का ओलंपिक चलता है और तू कह रहा है कोई नहीं खेलता।" जीतू चचा निरूत्तर हो जाते हैं।


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