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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

पुतला-दहन

पद्मा मिश्रा

बिरजू की आँखे रोते रोते सूज गईं ,थी,अब तो इन सूजी आँखों में आंसू का एक कतरा भी शेष नहीं बचा था --बस, चिंता थी कि बापू का अंतिम संस्कार कैसे होगा?पास में जितने पैसे थे -सब उनकी दवा दारू में खर्च हो गए ,अपने ठेकेदार मालिक से भी उधार नहीं ले सकता था क्योंकि बापू के इलाज में पहले ही इतना पैसा ले चूका था कि ,''और मांगने पर उसे नौकरी से ही निकाल देता ,,,उस पर नियति का खेल देखो कि तीन दिन से बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही है,- सूखी लकड़ियाँ इतनी महंगी कि पैसों के आभाव में उन्हें खरीदने की सोच भी नहीं सकता था बिरजू,,,,बारिश नहीं होती तो जंगल से ही सूखी लकड़ियाँ बटोर लेता या नेताजी से ही कुछ बंदोबस्त कर लेता ,,अब तो पड़ोसियों का ही आसरा है,,,,

वह बस्ती के हर दरवाजे पर गया ,,कुछ पैसे तो मिले पर उनसे सूखी लकड़ियाँ नहीं खरीदी जा सकती थीं ,,,,उसने नेताजी से गुहार लगाई --जवाब मिला --''कल ही दिल्ली से लौटे हैं --आराम कर रहे हैं,,, इस बारिश में लकड़ियाँ कहाँ से मिलेंगी--जा,भाग --'' बदले में में दया वश बीस रूपये नौकर फेंक कर चला गया,,,,''बिरजू को रोना आ गया,मजबूरी में अपना लकड़ी का हाथ-ठेला ही जलाने का विचार किया ,बापू को एक धोती में लपेट उसमे डाल दिया और घाट की ओर चल दिया ,,,,चौराहे पर भीड़ जमा थी,--बरसात में टूटी-फूटी सड़कों के विरोध में लोग नेता जी का पुतला जला रहे थे ,, पुतले के नीचे करीने से सजी सूखी लकड़ियों का बड़ा ढेर,,,बैनर,-घास-फुस ,जमा था ,,,बिरजू की आँखों में एक चमक आई,--पास खड़े बाबूजी से पूछा--बाबू,!,,मै इनमे से कुछ सूखी लकड़ी ले लूँ?-बापू का संस्कार करना है ,,'' लोग भड़क गए -मरने -मारने पर तुल गए ---''पगला गया है क्या ?,, लाश लिए घूमता है ?-लकड़ियाँ क्या तेरे बाप की हैं ,जा,भाग --कहीं और से मांग '',,,,वह चुपचाप सोचता हुआ आगे बढ़ गया ---वाह! भगवान --नेताजी की भी क्या तकदीर है, जिनके पुतले को भी सूखी लकड़ियाँ नसीब हैं पर एक इंसान ,को नहीं,,आज उस गरीब के लिए न तो लकड़ियाँ हैं ,,न चार कंधे ,,वहां सैकड़ों की भीड़ जमा है ,एक पुतला-दहन के लिए --'बिरजू सोच रहा था --ये लोग नेताजी का नहीं इंसानियत ,का पुतला-दहन कर रहे हैं,-- आज इंसानियत मर गई है


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