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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

आजादी

पद्मा मिश्रा

कमरे में टीवी तेज आवाज के साथ मौजूद था --गणतंत्र दिवस की धूम और जश्न का मुख्य समारोह दिल्ली से प्रसारित हो रहा था,गाँव से वर्षों बाद अपने बेटे के पास आये स्वतंत्रता सेनानी दादाजी पूरे जोश में थे,और पास बैठे पोते-पोतियों के साथ उत्साहपूर्वक स्व्तंत्रता की लड़ाई की यादें ताजा करते करते--कभी प्रसन्नता के आवेग में उछल पड़ते तो कभी धीरे से आँखें पोंछने लगते थे, .छोटे बच्चे तो कुछ अनुशासित - -एकाग्र हो टीवी पर आ रहे गणतंत्र दिवस कि परेड पर नजरें जमाये थे, परन्तु बड़े -युवा बच्चों को तो यह सारा आयोजन ही नागवार गुजर रहा था ,-किसी का क्रिकेट मैच तो किसी का फ़िल्म समारोह का प्रसारण समारोह छूटा जा रहा था,--''अरे,अब हो गया न? ,झंडा फहरा दिया जायेगा,फिर थोड़ी देर में राष्ट्र-गान , ,फिर क्या बचेगा ?दादाजी टीवी छोड़ देंगे,'' ,सब धीरे धीरे फुसफुसाते हुए एक दूसरे को सांत्वना दे रहे थे , ,

उधर दिल्ली में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी मंच की ओर बढ़ रहे थे -इधर दादाजी का फरमान जारी हुआ --'' सब खड़े हो जाओ '' ,-''क्यों?''-, छोटे बच्चे ने धीरे से पूछा ,

''राष्ट्रीय ध्वज को आदर देने के लिए'' , , वाक्य समाप्त ही हुआ था कि झंडा फहरा दिया गया और राष्ट्रीय गान प्रारम्भ हो गया --''जन-गण-मन ,अधिनायक जय हे ''दादाजी सावधान की मुद्रा में खड़े गुनगुना रहे थे ,बच्चे भी साथ गा रहे थे अपनी अनगढ़ -भाषामे -स्कूल में तो रोज ही गाते हैं,और जो खड़े नहीं थे दादाजी की घूरती नजरों के डर से खड़े हो गए पर राष्ट्र-गान तो याद ही नहीं था,-गाया होगा स्कूल में कभी ,- - अब इतने साल हो गए ,कौन याद रखता है! ,अब टीचरजी थोड़े ही न डांटने आएँगी ?''

राष्ट्र-गान समाप्त हो चूका था -दादाजी ने जोरदार आवाज में -कहा -''यही सीखा है तुमने अपनी शिक्षा से ,देश का, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना तुम्हे नहीं आता ?''

''अरे दादाजी,जब स्कूल में थे तब याद था,अब इंजीनियरिंग की मोटी मोटी किताबें पढ़ें ,उनके प्रोजेक्ट बनाएँ या राष्ट्र-गान याद करें?''

--'' शर्म आनी चाहिए तुम्हे-तुम लोग देश की उम्मीद हो,जब तुम्ही उसको आदर नहीं दोगे तो, , ,'', उस समय सारे बच्चे तो शांत होकर चुपचाप चले गए पर दादाजी के मन में सैकड़ों सवाल उठा गए - -एक स्वतंत्रता सेनानी,कर्मठ अधिकारी की भावी पीढ़ी को राष्ट्र-गान याद न हो,

--गणतंत्र का महत्त्व मालूम न हो ,--यह बात उन्हें पीड़ा पहुंचा रही थी, अपने बेटे को उन्होंने जो संस्कार दिए,उसे जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तों पर ,चलना सिखाया,-देश व् समाज के लिए जीना सिखाया,-वह तो अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए जीना सीख गया है,-अब उसकी भी उम्र हो गई है,शायद वह बच्चोंको संस्कार देना भूल गया,या जीवन की आपाधापी में धन कमाने की लालसा में ,सब कुछ छोड़ आगे निकल गया, -- बहू भी अपनी दुनिया में खुश है,-तभी तो ये बच्चे एक अनजानी -कल्पना कि दुनिया में जी तो रहे हैं पर अपनी पुरानी पीढ़ी के त्याग, आदर्श व् अनुभवों को पीछे भूल कर , ,'बाहर बगीचे में टहलते हुए दादाजी इन्ही गम्भीर विचारों में खोये हुए थे,-तभी गेट पर उनके मित्र शर्माजी ने पुकारा ,दादाजी अपने परम मित्र को देख कर खुश हो गए और लान में पड़ी कुर्सियों पर उनके साथ बैठते हुए --'बोले 'आज तुमसे बातें करने की तीव्र इच्छा हो रही थी,''-

-''क्या बात हुई ''शर्माजी ने वहीँ पड़ा अख़बार उठा लिया था, कुछ देर पढ़ने के बाद तुरंत बंद कर दिया,--''क्या हो रहा है चारो तरफ,-एक दिन भी ऐसा नहीं जाता -जब अख़बार अमन-शांति की बातें करता हो ' , ,दादाजी का मौन टूटा --''कैसी अमन -शांति?,सारा परिवेश ही उलटी धारा में बहा जा रहा है,-सबको जल्दी है आगे बढ़ जाने की,भौतिकता कि तलाश में -संस्कार-नैतिकता -आदर ,सब कुछ खो दिया है ,इस पीढ़ी ने ,-अब आज ही की बात लो,टीवी पर गणतंत्र दिवस की परेड आ रही थी ,लेकिन बच्चों को यह तक पता नहीं था कि राष्ट्र-गान क्या होता है,झंडे का आदर क्यों करें ?'' , , ,

शर्मा जी ने उनके थरथराते हाथों को थाम कर कहा --''हाँ,अब उन्हें फिल्मो के गीत जरुर याद और राष्ट्र-गान तो शायद ही किसी को याद हो ठीक से,अभी मै अपनी पोती के स्कूल में गया था,छोटे बच्चों की नृत्य-प्रतियोगिता,-कहाँ आठ से दस साल के बच्चे --'छैया,छैया ,डिस्को दीवाने ,मुन्नी बदनाम हुई जैसे गानो पर नाच रहे थे,मैं शर्मसार होकर लौटा,,-चाय आ गई थी ,अनुज उनका बड़ा पोता कहीं बाहर जा रहा था,शर्मा जी ने हाल -चाल पूछा,खेल रहे छोटे बच्चों ने समझा -अब भैया को डांट पड़ेगी,वे सब पास आगये -शर्मा जी ने पूछना शुरू किया --''तुम लोग बड़े होकर क्या बनोगे ?''

किसी ने कहा -'हीरो,किसी ने डाकटर और डांसर तो किसी ने जहाज उड़ाना पसंद किया -सबसे छोटे पोते ने कहा --मैं तो दादाजी बनूँगा,मार दूंगा सब दछमनो को -सब दर कर भाग जायेंगे -अंगरेज भागे थे न ,.है ना दादाजी ?'

''लेकिन कैसे ?-तुम तो छोटे हो अभी'', शर्मा जी को आनंद आ रहा था ,--'अपने माथे पर सलाम कि मुद्रा में हाथ रखते -कदम ताल करते हुए विभु ने जवाब दिया --ऐछे -वंदे मातरम -वंदे मातरम 'और लैफ्ट राइट करता अंदर चला गया ,प्रसन्नता के आवेग में दादाजी ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा --''देश अभी जिन्दा है शर्मा जी ,यही आजादी तो हमने चाही थी ''


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