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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

मेला

डॉ०नवीन दवे मनावत

मोहन पन्द्रह साल बाद गांव आया ।मोहन के लिये वह गांव कम और शहर ज्यादा हो गया था ।मतलब पूरा नक्सा बदल गया था ।मोहन का मित्र चंदु आकर कहता है अरे! मोहन कैसा है तु ,अपने शहर में मेला लगा है चलो देखने चलते है ।मोहन ने सोचा मेला तो गांव में लगता था मतलब गांव शहर कब हो गया।दोनो मित्र मेले में चलते है तो क्या देखता कि मेला स्थल की काया ही पलट गई ।पंद्रह साल पहले एक किलो मीटर पहले ही मेले की रौनक शुरू हो जाती थी

बेचने हेतु भारी संख्या पशु आदि आते थे व सड़क( कच्ची ) के दोनो तरफ पेड होते़ थे।वे सब सब कहा गये ।और मेला एक सीमित क्षेत्र में कैसे हो गया। मोहन चिंतन करने लगा ,तभी चंदु कहता है इतना कहा खो गया अब मेला छोटा हो गया है ।मशीनीकरण से पशु अब नहीं आते । अरे! धुआ नहीं दिखता तेरे को ,यहा फेक्ट्रियां लग गई है ।

मेला इनके नीचे दब गया है।और अपना गांव शहर बन गया है चंदु के स्वभाव और बातों में भी भिन्नता आ गई थी ।मोहन क्षुब्ध हो पुन: अपने स्थान चला गया।


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