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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

फिजूल ख़र्ची

दिनेश चन्द्र पुरोहित

सुबह के नौ बजे होंगे, आज़ अमन ने फिर पेंसिल लाने की मांग अपनी अम्मा के सामने रख दी ! मांग पेश करता हुआ, वह कहने लगा “अम्मा, कल चित्र-कला की परीक्षा है ! मुझे अभी के अभी, पेंसिल चाहिए !” मांग सुनकर, उसकी मां कनक प्रभा को गुस्सा आ गया, जो अभी-अभी मधुरिमा पत्रिका पढ़कर आयी थी ! जिसमें एक लेख छपा था ! जिसका उद्देश्य था “बच्चों की फिजूल-ख़र्ची करने की आदत में सुधार लाया जाय” ! इस लेख को पढ़कर, वह इस कमरे में अभी-अभी आयी ही थी ! बस, फिर क्या ? झट उसने फटकारते हुए उसे कह डाला ‘अभी कल ही, पेंसिल बाज़ार से दिलवाई है ! अब इतनी जल्दी दूसरी पेंसिल नहीं मिलेगी ! यह बेकार की फिजूल-ख़र्ची करना, बच्चों को शोभा नहीं देता !’

बेचारा मासूम बच्चा उसके डर के मारे, खामोश हो गया ! उसे डर था..न मालुम, कब अम्मा उसके कोमल गालों पर चपत लगा बैठे ? मगर यहाँ तो ख़ुद कनकप्रभा ध्यान रख न पायी कि, इस वक़्त अमन के पिताजी दीप टकटकी लगाकर उसकी गतिविधि बराबर देख रहे हैं !

कुछ समय बीता होगा, स्नान करके कनक प्रभा स्नानाघर से बाहर आयी ! अलमारी से कीमती नयी साड़ी बाहर निकालकर उसने पहन ली, जो उसने कल ख़रीदी थी ! जैसे ही वह बैठक के कमरे में बैठे दीप के पास आयी, और कहा “कहोजी, अमन के पापा ! साड़ी कैसी लग रही है ?” दीप मुस्कराता हुआ, बोला “मेडम ! कलर का क्या कहना ? साड़ी का कलर कोई हो, हरेक साड़ी आपके बदन पर अच्छी लगती है ! आख़िर, करें क्या ? तुम तो हर दो माह बाद फेशन बदलने का बहाना बनाकर, जिद्द करके नयी महंगी साड़ी उठा लाती हो ! आख़िर, हर माह तुम्हें किटी पार्टी में जाना पड़ता है !”

“क्या कह रहे हो, अमन के पापा ? मगर, आपको कोई कौन कहे ? सिगरेट के धुए उड़ाकर, हर सप्ताह सिगरेट के चार पैकेट खलास कर देते हो ?” तुनककर कनक प्रभा बोली !

“माफ़ करो, मोहतरमा ! साड़ियों का खर्च बर्दाश्त करते-करते, छ: माह बीत गए..जब से हमने इस पाश कोलोनी में मकान किराए पर लिया है, तब से तुम्हारी साड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है ! जिस दिन साड़ियों का खर्च बढ़ा, उसी दिन मैंने सिगरेट छोड़ दी ! जानती हो, बेचारे अमन के लिए पेंसिल खरीदनी कितनी ज़रूरी है ? कल चित्र-कला की परीक्षा है, इसको पहले H- किस्म की पेंसिल-hh दिलाई थी, HB-किस्म की पेंसिल नहीं ! तुमसे डरता हुआ उस दिन इसने HB-किस्म की पेंसिल खरीदी नहीं..जो चित्र-कला के लिए बहुत ज़रूरी थी ! अब तुम बताओ, फिजूल ख़र्ची कौन कर रहा है ? तुम, या अमन ?”

सुनकर, कनक प्रभा आगे एक शब्द बोल न पायी ! अब वह समझ गयी कि, “पहले बड़ों को फिजूल-ख़र्ची करने की आदत में सुधार लाना होगा, छोटे तो स्वत: अपनी आदत बड़ों को देखकर सुधार लेंगे !


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