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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

दोहे

सुशील यादव दुर्ग

आग लगी दिल में कहीं, तुम बैठी चुपचाप कुछ सदमे हैं आपसी ,तह में जाकर नाप # लिख के लाये लोग सब ,अपने-अपने लेख तेरी कृपा रुकी हुई , दिल्ली जाकर देख # हर कोई क्यों मारता ,बात-बात में लात जुता हुआ है आदमी ,कोल्हू के हालात # हर कोई है जानता , मेरे मन की बात केवल तुझे पता नहीं, कैसे बीती रात # हमको अब तुम छोड़ दो , रह लें अपने हाल जीवन के इस मोड़ पर ,जीना भले मुहाल # कफस-कफस खाली मिले ,पंछी हो आजाद किसी कूक कोयल कभी ,करे न कुछ फरियाद # हमको अपने इल्म पर , होता था अभिमान बिना पढा वो आदमी , खींच रहा है कान # समझौतों के बीच में ,कूद रहा ये कौन आपस का है मामला , रह लो तुम भी मौन # पानी-पानी हो गया ,खोजे पैर जमीन सुख का दिन जैसे हुआ ,अपने आप यतीम # तुम भी सुधार लो यहाँ , अपना हाल-नसीब रखो पाप से दूरियां ,उतना पुण्य करीब # माथे -माथे लिख दिया , पाप-पुण्य का खेल कोई बना मशालची, कोई पेरे तेल # मत जाओ तुम छोड़कर , दुविधाओं के बीच मन ये हरदम हारता , गहरी साँसे खींच # देख तड़फ या वेदना ,मन में हो संचार गर आंसू गिरते नही ,मागो कहीं उधार # दुविधा .... मैं रहती तालाब में,मगरमच्छ से बैर बकरी की सब मां कहें , मेरी कैसी खैर # मुझे पता तो ये चले ,कौन यहाँ बीमार संकट वाले मर्ज की , पास रखूं उपचार # नफरत के पासंग में ,प्यार रहे हो तौल इस माफिक व्यवहार का ,ज्ञात किसे है मोल # किन आखो से देखते ,सुनते हो किस कान सारी दौलत लूटने , घूम रहा शैतान # बोते हो दिन रात तुम ,नफरत के बस बीज गले कभी पहना करो , सदाचार ताबीज # सुबह भूल जो लौटता,देर गए जब रात उसकी क्या खातिर करें ,समझ दो ये बात # रोम- रोम सुलगा नहीं ,सुलग गया है रोम नफरत माने जानती ,कहते प्यार विलोम # बुना नहीं दिन एक में , प्रभु ये माया जाल मदिरा कहीं बना दिया,नारी कहीं कमाल # मेरी इच्छा है कभी ,पहनू काँटों ताज डरे हुए ईमान से ,जिन्दा रखूं समाज # समझो उधर दिमाग में ,फकत भरा है भूस बैठे गन्ना खेत में ,जड़ से लेते चूस # अगर किसी से हो गया , जन्मो जनम करार रखना अब तो छोड़ दो ,तुम भी पास उधार # किसको फुरसत जो सुने ,बातें अफलातून आराम तलब हो गया ,सुविधा में कानून # छूकर कौन चला गया ,मेरे मन के तार प्रीतम से मांगे बिना ,पा जाती उपहार # कौन गया है छीन कर,मुझसे राहत चैन पावस बरखा दूर है ,निस-दिन बरसें नैन ## डरा-डरा माहौल है ,सहमे-सहमे लोग ये कैसा कलयुग हुआ ,हर काया में रोग ##


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