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वर्ष: 3, अंक 43, अगस्त(द्वितीय) , 2018



जिंदगी बेमानी सी लगती है


डॉ० अनिल चड्डा


 
जिंदगी बेमानी सी लगती है,
फिर भी सुहानी लगती है।

कुछ मिला हो या न मिला हो,
यादें सब को दीवानी लगती हैं।

दीवारों की इबारत पढ़ी न जाये,
भाषा इनकी अनजानी लगती है।

झूठ-फरेब का बोलबाला है हर ओर
सच्चाई यहाँ अब कहानी लगती है।

दोस्ती करने  से बाज आ गए हम,
वफाओं की बातें पुरानी लगती हैं।

		 
 

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