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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



प्रवासी हिन्दी कहानी में आतंकवाद
(महिला कहानीकारों के विशेष संदर्भ में)


डॉ. मधु संधु


आतंकवाद शब्द आतंक+वाद से बना है। शब्द कोश के अनुसार आतंक के मूल में फारसी तंग शब्द माना गया है। तंग इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है। जिसका संस्कृत रूप तङक: है। तङक: धातु का अगला रूप तङ्ग: है। तङ्ग: में तंगी, डर और भय का भाव निहित है। “संस्कृत की सहोदरा और प्राचीन ईरान की भाषा आवेस्ता ने तङ्ग: से ही तंग रूप ग्रहण किया जो फारसी में भी चला आया।----- तङक: में जब आ उपसर्ग लगा तो बना आतङक: ----और इससे बने हिन्दी के आतंक शब्द का मतलब भय, डर, दहशत है। ---- आतंकवादी अर्थात वह व्यक्ति जो भयदोहन के जरिये अपना काम साधता है।“1

आतंक/ आतंकवाद नकारात्मक शब्द हैं और इनका सीधा संबंध राजनीति, अर्थ, अपराध और हिंसा से है। यह हिंसा का गैर कानूनी तरीका है। एक शोध के अनुसार इसके मूल में बेरोजगारी, विफलता, अन्याय, अपमान रहता है। भिन्न कारणों से सरकारें इसका समर्थन और विरोध करती हैं। आतंक फैलाने वालों अथवा आतंकवादियों के कोई नियम कानून नहीं होते। आज विश्व के लगभग सभी देशों में प्रशिक्षित आतंकवादियों की क्रूर, अमानवीय गतिविधियां देखने को मिल रही हैं, मानवता के सर्वनाश का यह तांडव चलता ही रहता है। आतंकवाद के ज्वलंत और वीभत्स उदाहरण अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 और भारत पर 26 नवम्बर 2008 के हमले हैं। आतंकवाद सत्ता की लड़ाई करते हुए सरकारों को अस्थिर करता है, किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था को हिलाकर रख देता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के रेजोल्यूशन 1373 के अनुसार आतंकवाद रोधी समिति की स्थापना की गई। 28 सितंबर 2011 को न्यूयार्क में इसकी दसवीं वर्षगांठ पर बैठक की अध्यक्षता भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरदीप सिंह पुरी ने की। इसमें आतंकवाद के विनाशकारी कृत्यों को रोकने और इन गतिविधियों के लिए धन न मुहैया करवाने की बात कही गई। आज विश्व के लगभग सभी देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हैं। आई. एस. आई. एस., अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा, तालिबान, बोकोहराम विश्व का खतरनाक और निर्दयी आतंकवादी संगठन अपने हमलों से लाखों- करोड़ों बेगुनाहों की हत्या कर चुके है। स्थिति यह है कि नित्य प्रति के समाचारों में आतंकवाद की खबर रहती ही रहती है। यहाँ वहाँ गुंडों का आतंक भी कम नहीं।

प्रवासी महिला कहानीकारों ने ब्रिटेन, अमेरिका, अफगानिस्तान, भारत के आतंकवादी हमलों, आतंकवादी बनने की प्रक्रिया, आतंकवाद के परिणाम झेल रहे साधारण लोगों की व्यथा और दुश्वारियों का चित्रण करते इस भयंकर सच की संवेदनशील तस्वीर प्रस्तुत की है। ब्रिटेन से उषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर, शैल अग्रवाल की कहानियों में यह क्रूर सच्चाई मिलती है। “ ब्रिटेन ही एक ऐसा देश है जहां आतंकवादी हरकतों को कानूनी तौर पर परिभाषित किया गया है।----उनके मुताबिक ऐसी कोई भी हरकत आतंकवाद है जिसमें किसी सरकार पर किसी काम को गैर कानूनी तरीके से करवाने के लिए जबरन दवाब डाला जाए। साथ ही आम जनता को राजनैतिक, धार्मिक या वैचारिक कारणो से धमकाना भी ब्रिटेन के कानून के मुताबिक आतंकवादी हरकत है।“2 उषा राजे सक्सेना की ’अस्सी हूरें, शिराज, मुनव्वर और जूलियाना’3 जेहाद के नाम पर संवेदनशील किशोर मुस्लिम बच्चों को आतंकवादी बनाए जाने की कहानी है। जन्नत में मिलने वाली अस्सी हूरों की बातें करके उन्हें सुसाइड बांबर बना दिया जाता है। शिराज मुनव्वर स्कूली छात्र है। सात भाई-बहनों में चौथे नंबर पर- एकदम उपेक्षित। जल्दी ही वह पाकिस्तान जाता है और वहाँ से आतंकवादी बनकर लौटता है। लंदन में 6 जुलाई 2012 को सुबह चार भयंकर बम ब्लास्ट होते हैं। 50 लोग मारे जाते हैं। 700 घायल होते हैं। कितने ही सुरंग में दब जाते हैं। शिराज मुनव्वर ने उस बस को उड़ाया है, जिसमें उसकी टीचर जूलियाना पोलेनेस्की भी थी। वह अब अपनी श्रवण शक्ति खो चुकी है। कहानी किशोरों को आतंकवादी बनाने की प्रक्रिया और उसके विश्वव्यापी वीभत्स परिणाम लिए है। यहाँ आतंकी यातायात के साधनों का दुरुपयोग कर रहे हैं।

शैल अग्रवाल की कहानी ‘अड़तालिस घंटे’4 भी लंदन में हुये बंब ब्लास्ट और विनाश के भयंकर रूपों को लिए है। डॉ. नंदिनी सिंह नौ मास की बेटी को क्रेच छोड़ अस्पताल में दिन भर काम करती है। इसी बीच किंग क्रॉस रेलवे स्टेशन, ट्रेन और तीन-चार और जगह हुए बम्ब धमाके लंदन के जीवन को तहस-नहस कर देते हैं। कुछ रास्ते सील हो जाते हैं । संत्रस्त नंदिनी किसी तरह लौट आती है कि तभी अस्पताल से बुलावा आ जाता है। पूरे अड़तालीस घंटे वह ज़िंदा- मुर्दा देहों के बीच बिताती है। कई ऑपरेशन करती है। इंसानी अंग काट-काट कर डस्ट –बिन में फेंकने पड़ते है। पति बेटी रिया को क्रेच से ले आता है। अपना परिवार सुरक्षित है, लेकिन इतना बड़ा हादसा उसे और पति को पूरी तरह आतंकित और संत्रस्त किए है। यानी आतंकवादियों के बम्ब विस्फोट निर्दोषों की जान लेते हैं, अपंग बनाते हैं और व्यक्ति, परिवार, समाज तथा राष्ट्र का बहुत कुछ लील जाते हैं।

दिव्या माथुर की ‘आशियाना’5 में उस नर्स आशा का वर्णन है, जिसने रात-रात भर काम करके अपना आशियाना यानि घर बनाया। लंदन की एक बस में हुई बोम्बिंग से आशा की गर्दन चूर-चूर हो जाती है, वह कोमा मे चली जाती है। कहानी आतंकियों द्वारा अपाहिज बना दी गई उस स्त्री को लिए है, जिसका स्वार्थी पति, बेटी रैना और बेटा प्रभात तो चाहते थे कि लाइफ सपोर्ट सिस्टम बंद करके उसे चैन से मरने दिया जाये और वे भी चैन से जिये, लेकिन बेटी लोरी और सखी नर्स जूड़ी के विरोध के कारण ऐसा नहीं किया जाता और चार महीने बाद उसे होश आ जाता है, जबकि वह पूर्ण पक्षाघात का शिकार हो चुकी है। पति अस्पताल से घर आशियाना न लाकर उसे एक सस्ते से नर्सिंग होम में भेज देता है, जहां नर्स एडवर्ड उसकी देख-भाल करता है। क्योंकि घर में पति जूडी के साथ रहने लगा है। बेटा अमेरिका चला जाता है, बेटियाँ अपने जीवन के सुखों और तनावों में व्यस्त हो जाती हैं। पैसों का संकट आने पर आशा घर तो आ जाती है, पर उसे जूड़ी और केशव के रिश्ते को स्वीकारना पड़ता है। एक मध्यवर्गीय, तिनका- तिनका जोड़ आशियाना बनाने वाली स्त्री को आतंकवाद शारीरिक रूप से अपाहिज, पारिवारिक रूप से निस्संग, फालतू, अनावश्यक बना देता है। कहानी में वस्तुवाद/ बाजारवाद/ आत्मकेंद्रण- चीख चीख कर कह रहा है, बीमार माँ या पत्नी को मर ही जाना चाहिए। आशियाने उनके लिए नहीं होते।

आम आदमी की ज़िंदगी और सुरक्षा पर अतिक्रमण करना भी आतंकवाद ही है। दिव्या माथुर की ‘ख़लास’6 गुंडों का आतंक लिए है। यह इंग्लैंड की सुरक्षित ज़मीन पर रहने वाली असुरक्षित युवती नीरा की कहानी है। नीरा ब्रिटेन के गुंडे बदमाशों के शहर हार्ल्सडन में अपनी माँ के साथ रहती है। एक ओर जॉनी जैसे गुंडों की नज़र उस पर है तो दूसरी ओर जमाइमा फरीद उसे धंधे में धकेलना चाहती है। ऐसे में नीरा गुंडों के बादशाह मार्टिन से शादी करके अपने जीवन को सुरक्षित करने का निर्णय लेती है। उनकी ‘जो सबके हित में हो’7 में भी गुंडों का आतंक है। आज पचपन वर्षीय नम्रता के दोनों बेटे लाली, पाली बाहर गए हैं। भरी दोपहर में तीन गुंडे तोड़- फोड़ करके उसके घर में घुस आते हैं। वह कुछ नहीं कर पाती, सिर्फ प्रार्थना करती है कि हे भगवान जो सबके हित में हो, वही करना। वे सारा सामान अपनी गाड़ी में डाल उससे लॉकर की चाबियाँ मांगते हैं। न देने पर हाथ की हड्डी तोड़ देते हैं। बलात्कार की बातें भी करते हैं। वह बेहोश होने का नाटक करती है तो दोनों बेडरूम में चाबियाँ ढूँढने लगते हैं। वह पिस्टल निकाल एक पर चला देती है। मामला बिगड़ता देख गाड़ी में बैठा गुंडा सामान ले भाग जाता है। ‘पंगा’8 की कैंसर पीड़ित नायिका पन्ना गुंडों से पंगा लेने से बचती है।

डेनमार्क की हिन्दी कहानीकार अर्चना पेन्यूली की ‘पहचान’9 अफगानिस्तान के लोगों की दुर्दशा लिए है। कहानी की नायिका डेनमार्क के आप्रवासन कार्यालय के बाहर हमान और आयशा को उनकी बच्ची नूसीन के साथ देखती है। वे इस्लामी देश अफगानिस्तान से हैं और उनके पास सफ़ेद रंग का भारत का एलियन पासपोर्ट है। अगली मुलाक़ात इंडिस्क फेयर में होती है। तब वे अपने बर्बाद हो रहे देश का हालात बताते हैं। सोवियत सैनिकों का हमला, मुजाहिदों की बर्बर जंग, पाकिस्तानी फौजें, तालिबान की जिहाद- सब ने मिल कर अफगानों पर जुल्म किए हैं। अपना देश छोड़कर उनका काफिला पाकिस्तान नहीं भारत आता है, ऊधमपुर के शरणार्थी शिविर में पनाह लेते हैं। क्योंकि वे अपनी पहचान पर पाकिस्तानी लेबल नहीं चाहते। अपनी पहचान के साथ जिहादी जोड़ना नहीं चाहते । भारत में एक वर्ष रहते है और फिर यूरोप के देश डेनमार्क में आ जाते हैं। आतंकवाद ने उन्हें बेवतन कर देश-देश ठोकरें खाने को विवश कर दिया है।

उनकी ‘अगर वो उसे माफ कर दे’10 पूर्वोत्तर भारत में बोड़ो आतंकवादियों/ नकसलवादियों से लड़ रहे और उसका शिकार हुये बहादुर कमांडर रवि की कहानी है। देश की आतंकवादियों से रक्षा के कारण घर परिवार से लगातार दूरी उसे रेशमा की ओर आकर्षित करती है। वह उसके बच्चे का बाप भी है। वह वात्सल्यमय पिता है। उसे बेटी ईशा के पन्द्रवें जन्मदिन पर उसके पास पहुंचना था। यहाँ प्रेमिका रेशमा है, ऐसी प्रेमिका जो प्रेमी के हत्यारों को मार कर ही दम लेती है। लेकिन बच्चे अनाथ तो हो ही जाते हैं। दो-दो स्त्रियॉं का संसार भी तहस-नहस हो जाता है। दो-दो बच्चों के सिर से पिता का साया उठ जाता है।

भारत के आतंकवाद का जिक्र अमेरिका में रह रही सुषम बेदी की ‘अजेलिया के फूल’11 में भी मिलता है। नायिका मिसेज मिलर भारत आती है तो पाती है कि लोग यहाँ संत्रस्त ही रहते हैं। आतंकवाद उनको घेरे है । इसीलिए वह यहाँ आना ही नहीं चाहती।

“एफ बी आई के मुताबिक 1980 के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका में आतंक वादी हमलों को 94 प्रतिशत गैर मुसलमानों द्वारा बढ़ावा दिया गया। - - - वहाँ मुसलमानो की तुलना में लैटिनो और यहूदियों द्वारा अमेरिकी धरती पर आतंकवाद के कृत्यों को अधिक किया गया है।“12 ‘ बुलेट्स आर नाट सिल्वर बुलेट्स’- यानी गोलियां समस्याओं का समाधान नहीं हैं। फिर भी आतंक की जघन्यता से निरपराध आम आदमी रोज ही दो-चार होता रहता है। सुषम बेदी की ‘ब्राडवे’13 में स्थानीय गुंडों की हैवानियत है। अमेरिका में आने वाले एशियाई यहाँ आकर इतनी मेहनत करते हैं कि मूल लोग अपने निठल्लेपन के कारण ईर्ष्यावश उन्हें अपने ढंग से आतंकित करते रहते हैं। कभी किसी सब्जी वाले की दुकान जला दी। कभी कोई अपराध करके किसी निरपराध को बंधक बना दिया। एक युवा दंपति खूब मेहनत और किफायत से जी रहा है। पुरुष दिन मे फलों की दुकान करता है और रात को घर में ताबूत बनाता है। अगर रेस्तरां में खाना खाएं और खाना बच जाए तो उसे पैक करवा कर अगले दिन के लिए घर ले आते है। उन्हें आने वाली सर्दियों के लिए गरम कपड़े लेने हैं। अच्छी कॉलोनी में घर लेना है। बच्चे को स्कूल भेजना है। एक रोज खाना खाकर लौटे परिवार के पुरुष को गुंडे पुलिस के कारण बंधक बना लेते हैं। बिना किसी अपराध के उसकी मृत्यु हो जाती है और उसी ताबूत में उसके शव को रख परिवार अपने देश लौट आता है। उनकी ‘पड़ोस’14 वृद्ध यहूदी दंपति एमा और अमेरिकन अरविन की कहानी है। यहाँ ताउम्र चलने वाला दूसरे विश्व युद्ध का आतंक है। एमा पहले विश्व विद्यालय में फ्रेंच पढ़ाती थी। सत्तर की उम्र में उसने नौकरी छोड़ दी। आज भी एमा पति का घर से निकलना बर्दाश्त नहीं कर पाती। सीढ़ियों तक आकार झगड़ने लगती है। पति अरविन की मृत्यु के बाद तो उसके घर का दरवाजा खुलना ही बंद हो जाता है। सिर्फ दिन और रात की नर्सें ही उसके पास आती हैं। मूलत: दूसरे विश्व युद्ध के समय फ़्रांस के जर्मन आक्युपेशन के दौरान भयंकर बमबारी और मौत के खतरों के बीच एमा घर की अंधेरी बेसमेंट में वर्षों छुपी रही थी। उसका सारा परिवार, यहाँ तक कि दो साल छोटा भाई भी नाज़िओ के हाथों मारा गया था। आतंक, दर्द और खौफ, मृत्यु भय और संत्रास उसके अंदर इतने गहरे धँसे हैं कि इंसानियत से उसका विश्वास ही उठ चुका है।

इला प्रसाद (अमेरिका) की ‘आधा पाठ’15 में गैस स्टेशन पर नौकरी कर रहे अवनीश को गुंडे गोली मार देते हैं और पत्नी नेहा अवसाद में चली जाती है। चार साल का रवि और दो साल की सोना सरकार के संरक्षण में फॉस्टर होम में पलने लगते हैं।

विकीपीडिया के अनुसार- “आतंकवाद को हिंसात्मक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जाता है। जो कि अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं विचारात्मक लक्ष्यों की परिपूर्ति के लिए गैर सैनिक अर्थात नागरिकों की सुरक्षा को भी निशाना बनाते हैं।“16 आतंक उत्पन्न करने के लिए तो गुंडे ही काफी होते हैं, लेकिन आतंकवादी संगठन निर्मम वीभत्सतता और संहार के पोषक हैं। आतंक गुंडों का हो या किसी प्रशिक्षित आतंकवादी संगठन का- दोनों का लक्ष्य स्व: स्वार्थ के लिए विध्वंस है। आतंकवादी अपने को स्वतन्त्रता सेनानी कहकर अपने दुष्कर्मों से छुटकारा नहीं पा सकते। कभी सरकारें इसको बढ़ावा देती हैं और कभी उन्मूलन की बात करती हैं। प्रवासी महिला कहानीकारों ने विभिन्न देशों के आतंक/ आतंकवाद और परिणामत: इसके अमानुषिक प्रभावों का चित्रण किया है।

संदर्भ:


1.http://shabdavali.blogspot.in/2009/12/blog-post_03.html
2.http://www.bbc.com/hindi/news/010922_issues_terrorism.shtml
3. उषा राजे सक्सेना, अस्सी हूरें, शिराज और जूलियाना, वह रात और अन्य कहानियाँ, सामयिक, नई दिल्ली, 2007
4. शैल अग्रवाल, अड़तालीस घंटे, कथाबिंब, जन- जून 2014, http://www.kathabimb.com/files/2014_1Q2QFull.pdf
5. दिव्या माथुर, आशियाना, हंस, सितम्बर 2015
6. वही, खल्लास, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली 2009
7. वही, जो सब के हिट में हो, अनहद कृति, अंक-6, 24 जून 2014, www.anahadkriti.com
8. वही, पंगा, पंगा तथा अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली 2009
9. अर्चना पेन्यूली, पहचान, सरिता, नई दिल्ली-55
10. वही, अगर वो उसे माफ कर दे, अभिव्यक्ति, 9 मार्च 2007
11. सुषम बेदी, अजेलिया के फूल, चिड़िया और छील, पराग, दिल्ली, 1995
12.http://www.muslimworld.in/fbi-ki-riport-me-khulasa-sabse-zyada-hamle-ger-muslim/
13. सुषम बेदी, ब्राडवे, चिड़िया और छील, पराग, दिल्ली, 1995
14. वही, पड़ोस, तीसरी आँख, पराग, दिल्ली, 2016
15. इला प्रसाद, आधा पाठ, तुम इतना क्यों रोई रूपाली, भावना, दिल्ली, 2014
16.https://hi.wikipedia.org/wiki/आतंकवाद
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