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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



हे राम !


सुशांत सुप्रिय


15 अगस्त का दिन था । सरोजिनी नगर की एक सरकारी कॉलोनी में एक ऊँघते हुए बुधवार की सुबह अलसाई पड़ी थी । बाहर लॉन में कुछ ऐंठे हुए पेड़ खड़े थे जिन पर बैठे हुए कौए शायद स्वाधीनता-संग्राम की कोई कथा सुन-सुना रहे थे । कॉलोनी के गेट के बाहर बने कूड़ा-घर के पास तीन बंदर इधर-उधर घूम कर कुछ-कुछ खा रहे थे , जबकि कुछ आवारा कुत्ते दूर से ही उन पर भौंककर अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे थे । मकानों के बाहर जगह-जगह कूड़ा-कचरा फैला हुआ था । वातावरण में बदबू थी । सड़ाँध थी । लगता था जैसे पास ही कहीं कुछ मर गया हो । जैसे इलाक़े के सफ़ाई कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हों । कॉलोनी के अधिकांश लोग सुबह नौ बजे तक सोए पड़े थे । जल्दी उठ गए कुछ लोग बदबू के बावजूद लॉन में खड़े होकर धूप सेंकने के महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त थे ।

अचानक लोगों ने देखा कि कोने वाले मकान का दरवाज़ा धड़ाक् से खुला और गृह मंत्रालय में अनुवादक अट्ठावन वर्षीय श्री भागीरथ प्रससा टोकरा और झाड़ू लेकर घर से बाहर निकले । उन्होंने आव देखा न ताव , जगह-जगह पड़ा कूड़कचरा टोकरे में डाल कर कॉलोनी के बाहर बने कूड़ा- घर में जाकर फेंकना शुरू कर दिया ।

पर वहाँ मौजूद लोग उनकी इस हरकत से हैरान रह गए । खुसर-फुसुर होने लगी । जितने मुँह उतनी बातें । कुछ लोग उनकी इस हरकत पर हँसने लगे , कुछ फ़िकरेबाज़ी करने लगे --

" भागीरथ बाबू पागल हो गए हैं । "

" इनकी इन्हीं हरकतों की वजह से इनके बीवी-बच्चे इन्हें छोड़ गये ।“

" इनकी ऐसी बेहूदा हरक़त की वजह से कॉलोनी की इमेज कितनी ख़राब होगी । "

" लगता है , गाँधीजी की भटकती आत्मा इन्हीं में घुस गई है । "

" अरे , कोई इन्हें समझाओ-बुझाओ । कोई इन्हें रोको । "

शोर सुनकर धीरे-धीरे कॉलोनी के बहुत-से लोग लॉन में जमा हो गए । लोग उद्विग्न थे । यह एक गम्भीर मसला था । एक हिला हुआ आदमी कॉलोनीवासियों की छवि धूमिल करने के दुष्कार्य में लगा हुआ था । लोगों का पुनीत कर्तव्य था , उनका जन्म-सिद्ध अधिकार था कि वे उस व्यक्ति को ऐसा करने से रोकें ।

उधर भागीरथ बाबू इस सब से बेख़बर किसी धुनी व्यक्ति की तरह चारो ओर का कूड़ा-कचरा साफ़ करने में जुटे हुए थे । उन्होंने अपनी क़मीज़ और पैंट उतार दी थी और कच्छे-बनियान में ही अपने सफ़ाई-अभियान में जुट गए थे । उन्होंने दिखावे के लिए हाथ में झाड़ू नहीं पकड़ी थी । वे इतने मन से , इतने लगन से कॉलोनी की गंदगी साफ़ कर रहे थे जैसे कोई भक्त भगवान् की पूजा-अर्चना करता है । चश्मा पहने हुए वे यह काम इतनी मेहनत से कर रहे थे कि उनका पूरा बदन पसीने से लथपथ था । इलाक़े का कूड़ा-कचरा और गंदगी साफ़ करते हुए वे अब किसी जुनूनी व्यक्ति-से लग रहे थे ।

" चारो ओर गंदगी फैली हुई है । पूरा देश एक बहुत बड़ा कूड़ा-घर बन गया है । सब गंदगी फैला रहे हैं । इसी बदबू में साँस ले रहे हैं । पर सफ़ाई की किसी को फ़िक्र नहीं । एक बूढ़ा मसीहा जब देश से गंदगी साफ़ करने के काम में जुटा था तब किसी बदबूदार आदमी ने 30 जनवरी , 1948 के दिन उन्हें गोली मार दी । आज़ादी के बाद के इतने सालों में देश में कितनी गंदगी फैल गई है । क्या हम अपने बच्चों को ऐसा गंदा समाज विरासत में देंगे ? अब इस गंदगी को साफ़ करना ज़रूरी हो गया है ...। " भागीरथ बाबू ज़ोर-ज़ोर से बड़बड़ा रहे थे और कॉलोनी का कूड़ा-कचरा साफ़ करते जा रहे थे ।

भीड़ में खड़े शुक्ला जी स्वास्थ्य विभाग में सचिव थे । वे अपनी स्टडी में बैठे ' बिना पानी वाला झरना ' नाम की किताब पढ़ रहे थे । लोगों का शोर सुनकर वे किताब बीच में ही छोड़कर बाहर आ गए । सारा माजरा देखकर उन्होंने लोगों को समझाया -- " हमें जल्दी ही कुछ करना होगा । यह आदमी ' मिसप्लेस्ड आइडियलिज़्म ' का मारा है । विक्षिप्त हो गया है । अपने-आप को महात्मा गाँधी समझने लगा है । ही इज़ ए मेनिएक सफ़रिंग फ़्राम डिल्यूज़न । पहले भी हमने इसे भिखारियों और कूड़ा-कचरा बीनने वालों के साथ मेल-जोल बढ़ाते हुए देखा है । ऐसे व्यक्ति सोचते हैं कि वे दुनिया बदल देंगे , क्रांति ला देंगे । एक्चुअली , सच पीप्ल कैन बी डेंजरस टु देमसेल्व्ज़ ऐज़ वेल ऐज़ टु द सोसायटी ऐट लार्ज । अगर हम-आप इसे रोकने जाएँगे तो हो सकता है यह वायलेंट हो जाए ... क्यों न हम पुलिस बुला लें ? "

बाक़ी लोगों को उनकी बात सही लगी । लिहाज़ा सब ने उनकी बात का समर्थन किया । यह पागल आदमी कॉलोनी में रहने वाले सभी अधिकारियों की छवि धूमिल कर रहा था । इसके दिमाग़ में ' आउटडेटेड आइडियलिज़्म ' का कीड़ा घुस गया था । यह सनकी सफ़ाई करके यहाँ गंद फैला रहा था । यहाँ का माहौल दूषित कर रहा था । इसे रोकना ज़रूरी था । कॉलोनी के छोटे बच्चों पर इसकी इस बेहूदा हरकत का क्या असर पड़ेगा ? यह पागल देश के फ़्यूचर को ख़राब कर देगा । बच्चों को तो ऐसे आदमी की छाया से भी दूर रखना होगा ।

तत्काल सभी बच्चों को वहाँ से हटाकर टी. वी. पर कार्टून चैनल देखने की सुरक्षा में भेज दिया गया । बच्चे यदि यहाँ रहते तो भागीरथ बाबू की ऊटपटाँग हरकतों की वजह से उनके बिगड़ जाने का ख़तरा था ।

यह वह समय था जब पूरा युग गंदगी और बदबू में सना पड़ा था । हज़ारों करोड़ का घपला करके लोग आराम से देश छोड़ कर भागे जा रहे थे । सारे शहर का मैला समेटे एक बदबूदार , गंदा नाला लोगों के भीतर बह रहा था । लोग धड़ल्ले से झूठ बोल रहे थे , जालसाज़ी और मक्कारी कर रहे थे , दोगलेपन और बदनीयती के पंक में डूबे थे । न निष्ठा बची थी , न मूल्य बचे थे । सब अवसरवाद का झुनझुना बजा रहे थे , अनैतिकता की दारू पी कर मस्त थे । बाज़ार का कीचड़ घरों में घुसता जा रहा था । असहिष्णुता अपने चरम पर पहुँच गई थी । अल्पसंख्यक और दलित असुरक्षित महसूस कर रहे थे । दरअसल यह गंदगी नहीं थी , जीने का एक पूरा बदबूदार , काला नज़रिया था । ऐसे समय में जब 15 अगस्त की सुबह भागीरथ बाबू अपनी कॉलोनी की गंदगी साफ़ करने के अभियान में कूदे तो यह स्वाभाविक ही था कि लोग उन्हें ' पागल ' कहें । महज़ फ़ोटो खिंचवाने के लिए हाथ में झाड़ू पकड़ लेना और बात है ! यदि आज गाँधीजी जीवित होते तो यह युग उन्हें भी पागल की संज्ञा देता ।

इधर कॉलोनी के लोग पुलिस का फ़ोन नम्बर लगा रहे थे , उधर भागीरथ बाबू अब कॉलोनी के बाहर बने सार्वजनिक शौचालय की गंदगी साफ़ करने में जुटे थे । भीड़ में से कोई चिल्लाया -- " अबे , गाँधी की औलाद , सुधर जा । " पर भागीरथ बाबू पर इसका कोई असर नहीं हुआ । वे पहले की तरह तन-मन से अपने काम में जुटे थे । बीच-बीच में वे जगजीत सिंह द्वारा गाई साबिर दत्त की ग़ज़ल की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगते थे --

" सच्ची बात कही थी मैंने लोगों ने सूली पे चढ़ाया मुझ को ज़हर का जाम पिलाया फिर भी उनको चैन न आया सच्ची बात कही थी मैंने ..."

भीड़ बढ़ती जा रही थी ।

" बुड्ढा सठिया गया है ," भीड़ में खड़े लोग एक-दूसरे से कह रहे थे । तभी भीड़ में से न जाने किस ने एक पत्थर उठा कर भागीरथ बाबू को दे मारा । पत्थर उनकी कनपटी पर जा लगा । वहाँ से ख़ून बहने लगा । न जाने उस पत्थर से सिर में लगी चोट का असर था या कोई और कारण था , लोगों ने देखा कि घायल भागीरथ बाबू सार्वजनिक शौचालय के बाहर पड़े बड़े से कूड़े के ढेर पर जा चढ़े । उसके बाद उन्होंने भीड़ को सम्बोधित करके आवेश में चिल्लाना शुरू कर दिया --

" समाज में गंदगी फैलाने वालो , भारत छोड़ो ! चमचमाती , लम्बी , चलती गाड़ियों में से बीच सड़क पर पेप्सी और कोका कोला की प्लास्टिक की ख़ाली बोतलें और मैक्डॉनल्ड और पिज़्ज़ा-हट के रैपर और गंदे नैपकिन फेंकने वालो , भारत छोड़ो । सफ़ेदपोश गुंडो , भारत छोड़ो । लचकते नितम्बों और उतावले उरोजों वाली अधनंगी देशी-विदेशी डांसरों के फूहड़ गानों पर नाचने वालो , भारत छोड़ो । काले अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो । "

" बुड्ढा पागल हो गया है । पुलिस को बुलाओ । " यह सब सुनकर भीड़ में खड़े लोग एक-दूसरे से कह रहे थे ।

यह वह समय था जब महात्मा गाँधी का चरख़ा कूड़ेदान में पड़ा था और उनका चश्मा किसी ब्लू-लाइन बस के नीचे दबकर नष्ट हो चुका था । यह वह समय था जब गाँधीजी की लाठी गुंडों के हाथों में आ गई थी , जो गाँधी जी के आदर्शों को उनकी बकरी के साथ ही मार कर पका कर खा गए थे । उनकी विचारधारा का क़त्ल करने वाले लोग लोकतंत्र की महिमा से उच्च पदों पर आसीन हो गए थे । महात्मा गांधी की याद में हर नेता और सरकारी अफ़सर के कमरे में उनकी एक फ़ोटो टाँग दी गई थी । उनकी याद में देश में हर साल एक दिन की छुट्टी दी जा रही थी , एक दिन का 'ड्राइ-डे' घोषित किया जा रहा था । उनके नाम पर कुछ सड़कों , भवनों और विश्वविद्यालयों के नाम रख दिए गए थे । एकाध सरकारी कार्यक्रम चलाया जा रहा था । उनकी याद में कुछ फ़िल्में बनाई जा रही थीं , जिनमें दिखाई जाने वाली ' गाँधीगिरी ' उन्हीं फ़िल्मों तक सीमित थी । गाँधीजी के लिए इतना सब करने के बाद व्यवस्था में उच्च पदों पर बैठे लोग उनके सपनों के भारत का क़त्ल करके उसे गाँधीजी की समाधि पर ही दफ़ना आए थे । सफ़ेदपोश गुंडे देश में साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने और फ़रेब के नंगे नाच में लिप्त थे । गाँधीवाद देश में मृतप्राय पड़ा था ।

लोगों ने फ़ोन करके पुलिस बुला ली । पुलिस-वालों ने आते ही घायल भागीरथ बाबू को गिरफ़्तार कर लिया । उन्हें ' सार्वजनिक स्थल पर शांति भंग करने ' के अपराध में गिरफ़्तार किया गया । लोगों ने रिपोर्ट दर्ज़ कराई कि भागीरथ बाबू का मानसिक संतुलन बिगड़ गया था । उनकी हरकतें सभ्य समाज के लिए ख़तरा थीं । लिहाज़ा उन्हें इस तरह कॉलोनी में खुला घूमने की इजाज़त नहीं दी जा सकती थी । कुछ लोगों ने पुलिस से यह भी शिकायत की कि भागीरथ बाबू ने कॉलोनी के उन कुछ युवकों पर पत्थर भी फेंके थे जो उन्हें समझाने-बुझाने के लिए उनके पास गए थे , हालाँकि इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी । कॉलोनी में रहने वाले सभी लोग विभिन्न मंत्रालयों में अधिकारी थे । उनका कहना था कि उन्हें तथा उनके बीवी-बच्चों को भागीरथ बाबू जैसे पागल आदमी से जान-माल का ख़तरा था ।

इस सब के बीच न जाने कैसे एक नौ-दस साल का बच्चा अपने घर से बाहर निकल आया था । जब पुलिस भागीरथ बाबू को गिरफ़्तार करके उन्हें गाड़ी में बैठाकर ले जाने लगी तो वह बच्चा आगे आ गया और कहने लगा -- " पुलिस अंकल , आप भागीरथ अंकल को पकड़ कर क्यों ले जा रहे हो ? वो कोई चोर-बदमाश थोड़े ही हैं ? भागीरथ अंकल तो हमारे लिए असली में हमारे कॉलोनी की सफ़ाई कर रहे थे । वो कोई फ़ोटो खिंचवाने के लिए नक़ली में हाथ में झाड़ू पकड़कर इधर की गंदगी उधर थोड़े ही फैला रहे थे ? "

इस पर उस बच्चे के मम्मी-पापा उसे पकड़ कर घर के अंदर ले गए ।

इसके बाद जो कुछ हुआ वह आश्चर्यजनक था । प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जब पुलिसवाले भागीरथ बाबू को गिरफ़्तार करके पुलिस की जीप में बैठा कर आगे बढ़े तो कूड़ा-घर के पास शांत भाव से घूम-फिर कर कुछ-कुछ खा रहे तीनों बंदरों ने अचानक कुपित हो कर पुलिसवालों पर हमला कर दिया । बंदरों का यह रौद्र रूप देखकर पुलिसवाले भागीरथ बाबू को जीप में ही छोड़कर वहाँ से भाग खड़े हुए । और तब एक हैरान कर देने वाली बात हुई । वे तीनों बंदर पुलिस-जीप में हथकड़ियाँ पहने बैठे घायल भागीरथ बाबू के पास आए और प्यार से उनके हाथ चाटने लगे । प्रत्यक्षदर्शियों का यह भी कहना है उन्होंने उस दिन उन तीनों बंदरों को रोते हुए देखा । वे भागीरथ बाबू के हाथ चाट रहे थे , उनके हाथों को सहला रहे थे , जबकि उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे । बाद में पुलिसवालों ने डंडों से मार-मार कर बड़ी मुश्किल से उन तीनों बंदरों को भागीरथ बाबू से अलग करके उन्हें वहाँ से भगाया । उन तीनों बंदरों के साथ हुई मुठभेड़ में कई पुलिस वाले घायल भी हो गए ।

प्रत्यक्षदर्शियों का तो यहाँ तक कहना है कि उसी समय कॉलोनी के पेड़ों पर बैठे कुछ कौवों ने भी पुलिसवालों के सिर पर चोंचों और पंजों से हमला कर दिया । इलाक़े के लोग बताते हैं कि उस दिन भागीरथ बाबू के साथ-साथ इलाक़े के वे तीनों बंदर और कौवे भी पागल हो गए थे ।

ताज़ा समाचारों के अनुसार श्री भागीरथ प्रसाद शहर के पागलखाने में बंद हैं । उनसे मिलने गए कॉलोनी के इक्का-दुक्का लोगों का कहना है कि वे अब पूरी तरह से पागल हो गए हैं । पागलखाने में वे कई-कई दिनों तक मौन-व्रत धारण कर लेते हैं । बीच-बीच में जब कभी वे अपना मौन-व्रत तोड़ते हैं तो पागलखाने के अधिकारियों से कहते हैं कि वे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी हैं । उन्हें पागलखाने से आज़ाद किया जाए ताकि वे समाज को गंदगी से आज़ादी दिला सकें । फिर वे अपने लिए चरखे की माँग करने लगते हैं । पागलखाने के कर्मचारी बताते हैं कि कभी-कभी वे देर तक खुद से बातें करते रहते हैं । कभी न मालूम क्यों हँसने लगते हैं , कभी रोने लगते हैं । कभी रहते-रहते आहें भरने लगते हैं और ' हे राम ' , ' हे राम ' कहने लगते हैं । पागलखाने के कर्मचारियों का यह भी कहना है कि कभी-कभी बीच रात में उनके कमरे में से जगजीत सिंह द्वारा गाई साबिर दत्त की इस ग़ज़ल की दर्द भरी आवाज़ आती है जो देर तक पागलखाने के गलियारों में गूँजती रहती है --

" सब से बेहतर कभी न बनना जग के रहबर कभी न बनना पीर-पैग़म्बर कभी न बनना सच्ची बात कही थी मैंने लोगों ने सूली पे चढ़ाया मुझ को ज़हर का जाम पिलाया फिर भी उनको चैन न आया सच्ची बात कही थी मैंने ... "
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