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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



गीत-
"प्रेम गुहार लगाऊँ"


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
मान-मर्यादा भूल कर, प्रेम गुहार लगाऊँ,
तुम नहीं आ सकते अगर, खुद ही मैं आ जाऊँ।

सोच-सोच दिल हारा है, जीवन में कौन हमारा है,
प्रेम अगर कभी हो हमें, दुनिया को ये न गँवारा है,
तुमने फेर ली नज़र अगर, प्रेम कहाँ मैं पाऊँ।
मान-मर्यादा भूल कर, प्रेम गुहार लगाऊँ,
तुम नहीं आ सकते अगर, खुद ही मैं आ जाऊँ।

दर्द ही मिलता है उनको, जो दर्द न देना चाहें,
प्यार मिले हर राह पे हमको, कहाँ मिलें वो राहें,
जो दिल चोट से तड़पे न, वो दिल मैं कहाँ से लाऊँ।
मान-मर्यादा भूल कर, प्रेम गुहार लगाऊँ,
तुम नहीं आ सकते अगर, खुद ही मैं आ जाऊँ।

धोखों का सब खेल है, इस खेल में माहिर हैं सभी,
जो खेल सके न खेल ये, वो जीत न पाता है कभी,
जिस दुनिया में कोई फरेब न हो, वो जहाँ मैं कैसे बनाऊं।
मान-मर्यादा भूल कर, प्रेम गुहार लगाऊँ,
तुम नहीं आ सकते अगर, खुद ही मैं आ जाऊँ। 
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