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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



अहसास ....!


सुशील यादव


 [2212 2212 1222 2]
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है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है
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मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है
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हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है
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जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है
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गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सीखा देता है
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अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है
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मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है
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है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है
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मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है
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