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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



बदनाम 'सुशील' बुरा हो जाता....


सुशील यादव


 		 
काश सभी कुछ सोचा हो जाता
समझो कितना अच्छा हो जाता
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तेरे तसववुर पागल हम रहते
हरदम कोई धोखा हो जाता
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लिखते अपनी जो राम कहानी
शहरो-शहरो फतवा हो जाता
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इतनी साफ हकीकत भी होती
तेरे जितना रुतबा हो जाता
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खत को हम अगर जला ना देते
बदनाम 'सुशील' बुरा हो जाता
 
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