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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



टूट गई है लय जीवन की


देवमणि पांडेय


 		 
टूट गई है लय जीवन की सुर ग़ायब हैं ताल नहीं है
क्या कुछ हमसे छूट गया है इसका हमें ख़याल नहीं 

अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए
ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं 

दिनभर खटा धूप में लेकिन कुछ भी हाथ नहीं आया
क्या खाएंगे बच्चे आख़िर घर में आटा दाल नहीं
 
क्या क्या नहीं दिया बचपन को इंटरनेट की दुनिया ने
बच्चों के अफ़सानों में क्यूँ वो बूढ़ा बेताल नहीं  

दौलत वालो! देखलो आकर क्या हैं ठाट फ़क़ीरों के
जहाँ भी रहते ख़ुश रहते हैं भले जेब में माल नहीं 

ख़्वाबों को मंज़िल दे पाना बेहद मुश्किल है लेकिन
जाने क्यूँ यह भी लगता है इसमें कोई कमाल नहीं
 
अच्छा दिखने की ख़्वाहिश तो हर इंसां में होती है
फिरभी जो बदनाम है उसको इसका कोई मलाल नहीं
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