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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



ख़ुशबुओं की शाल


देवमणि पांडेय


 		 
ख़ुशबुओं की शाल ओढ़े रुत सुहानी मिल गई 
दिल में ठहरे एक दरिया को रवानी मिल गई 
 
कुछ परिंदों ने बनाए आशियाने शाख़ पर
गाँव के बूढ़े शजर को फिर जवानी मिल गई
 
आ गए बादल ज़मीं पर सुनके मिट्टी की सदा
सूखती फ़सलों को पल में ज़िंदगानी मिल गई 
 
घर से निकला है पहनकर जिस्म ख़ुशबू का लिबास
लग रहा है गोया इसको रातरानी मिल गई 
 
जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको ही पढ़ता रहूँ
याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई 
 
माँ की इक उँगली पकड़कर हँस रहा बचपन मेरा
एक अलबम में वही फोटो पुरानी मिल गई 
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