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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



बेखबर मिट्टी


अशोक अंजुम


 		 
हवा - पानी की साजिश से रही यूँ बेखबर मिट्टी 
लगीं हैं  दीमकें  जबसे  हुआ  सारा शजर मिट्टी 

यहाँ मिट्टी वहाँ  मिट्टी , जिधर देखो उधर  मिट्टी 
ये कैसी धुंध छायी है लगे है कुल शहर  मिट्टी !

मैं अपने खेत गिरवी रख के जबसे शहर में आया 
मेरी आँखों में  चुभती ही रही सारी उमर  मिट्टी !

मिले ऐसे कि जैसे अजनबी से कोई मिलता है 
बड़ी हसरत से आये थे हुआ सारा सफ़र  मिट्टी !

ज़रूरी है कि खुलते भी रहें खिड़की-ओ-दरवाज़े 
वगरना हो न जाए एक दिन ये तेरा घर  मिट्टी !

ज़रा-सा बीज था कल तक वो अब आकाश छूता है 
बना दे बूँद को सागर रखे क्या-क्या हुनर  मिट्टी !

हुआ था हादसा यूँ तो भरे बाज़ार अंजुम जी 
कोई कुछ क्यों नहीं कहता हुआ क्या  हर बशर  मिट्टी !

हुआ जब ख़त्म साँसों का सफ़र तब रूह ये बोली 
चलो चलते हैं अंजुम अब यहाँ की छोड़कर  मिट्टी !
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