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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



आँगन की दीवार अलग


अशोक अंजुम


 		 
खाना- पीना, हंसी-ठिठोली , सारा कारोबार अलग !
जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार  अलग !

पहले इक छत के ही नीचे  कितने उत्सव होते थे,
सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार  अलग !

पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी 
सारे रिश्ते एक तरफ हैं लेकिन माँ का प्यार  अलग !

कैसे तेरे - मेरे रिश्ते को मंजिल मिल सकती थी 
कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग !

जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है 
तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार  अलग !

अब पलटेंगे,  अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है 
'अंजुम जी' अपना अन्दाज़ा हो जाता हर बार  अलग !
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