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वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



दिल ने कभी माननी न थी


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
गम नहीं सह पाते तो हसरत पालनी न थी,
यूँ अपनों की ख्वाहिश तो मारनी न थी।

जवानी की उमंगों का किसी से क्या कहिये, 
अपनी बात पकड़ कर हमें हारनी न थी।

समाया जज्बातों में था कोई अजीब सा नशा,
चढ़ गई हम को तो कभी उतारनी न थी। 

वो हैराँ-पशेमाँ रहे जुनून से मेरे सदा,
कोई हरकत हमें भी अपनी संवारनी न थी।

दिल तो कहता रहा ‘अनिल’ को रुक जाने को,
हमको लेकिन कभी उसकी माननी न थी।
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