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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



डॉ० रिक लिंडल द्वारा रचित अंग्रेजी पुस्तक 'The Purpose' का हिंदी अनुवाद
अध्याय 1
[.....पिछले अंक से]
गर्मी के दिन


लेखक: डॉ० रिक लिंडल
अनुवादक: डॉ० अनिल चड्डा


रिक्की को यह महसूस कराया गया कि उसका फार्म में स्वागत था. फार्महाउस 1929 में बनाया गया था और कंक्रीट का बना था. छत की तीन चोटियाँ थी जिन्हें लाल रंग से पेंट किया गया था और बाहर की दीवारें चाक की सफेद थीं. अंदर लकड़ी का फर्श लगा था, और दीवारें इन्सुलेशन के लिये सूखी घास से भरी हुईं थी. एक तहखाना था, एक मुख्य मंजिल, और एक द्वितीय मंजिल थी जिसमें छ: शयनकक्ष थे, दोनों तरफ तीन-तीन, छत की चोटियों के नीचे, जिनके बीच गलियारा था. एक छोटा सा बिजली का जनरेटर फार्म की मुख्य मंजिल और तहखाने में रौशनी के लिये लगा हुआ था, लेकिन दूसरी मंजिल के शयनकक्षों में कोई बिजली नहीं थी.

फर्श चरमराते थे जब लोग उन पर चलते थे, और, रात और दिन, सारा घर ऐसा लगता था कि भूतों से सक्रिय है. चीजों को और डरावना बनाने के लिये, एलिन, किसान की पत्नी ने बताया कि जब वह रात को गलियारे से गुजरती थी तो एक भूत अक्सर उसके बालों को सहलाता था. (रिक्की हालांकि भूतों की उपस्थिति से परिचित था क्योंकि शहर में उसका घर प्रकट रूप से बहुत पुराने कब्रिस्तान पर बना हुआ था. लोगों के बात करने का शोरगुल वाला हो-हल्ला और रात को तहखाने में बिजली का बंद होना और जलना उसके घर में असामान्य नहीं था.)

फार्म के सामने एक ढलान के निचले भाग पर एक कब्रिस्तान भी था, सामने वाले दरवाजे से लगभग 150 फुट की दूरी पर था, जहाँ रिक्की के दादा-दादी और दूसरे रिश्तेदार दफनाये गये थे. फार्म के पीछे तहखाने के एक कमरे में चूजे थे, जिसमें एक रैंप था जिस पर से वह दिन में दाना खोजने के लिये बाहर जा सकते थे. एक गोशाला भी थी, जिसे अस्सीवें दशक के बाद के वर्षो में बनाया गया था, जो गोल पत्थर और सूखी घास वाली दीवारों और घास से मिली हुई मिट्टी की छत, जिसे लकड़ी के गट्ठों और शहतीरों से सहारा दिया गया था, से बनी हुई थी, और फार्म के पीछे लगभग 150 फुट की दूरी पर एक ढलान पर थी.

रिक्की स्वयं ही दक्षिणी शयनागार के कमरे में सोता था. रात्रि की मेज पर एक तेल का लैम्प रखा हुआ था ताकि वह सोने से पहले कपड़े उतारने और पढ़ने के लिये, यदि वह चाहे तो, देख पाए. उसकी चचेरी बहनें गलियारे के दूसरी ओर के कमरों में सोती थीं. चूहे दीवारों में व्यस्त रहते थे, और चूहेदानियाँ कम भाग्यशालियों को पकड़ने के लिये, जो रात में कमरे में आने का साहस करते थे, रखी हुईं थीं. चूहेदानियाँ रात में खुलती थीं, और सुबह उठ कर पहला काम यह होता था कि उन्हें खाली किया जाये. सिग्गी उत्तरी शयनागार के एक शयनकक्ष में सोता था, जबकि उसकी पत्नी, एलिन, सिग्गी के अधिक खुर्राटों के कारण, जो ऊपरी मंजिल पर चारों ओर गरजते थे और वस्तुतः सारी खिडकियों की चौखटों को झनझना देते थे क्योंकि उन्हें बंद करने के लिये कोई चिटकनी नहीं थी, नीचे मुख्य मंजिल पर सोती थी. भाग्यवश, रिक्की दिन में फॉर्म पर काम करने के कारण थका हुआ होता था, और वह सामान्यतया चूहों द्वारा दीवार में की जाने वाली आवाज, सिग्गी के खुर्राटों, घर में खौफनाक चरचराहट, और उसके शयनकक्ष के बाहर गलियारे में कभी-कभी आने वाली भूतों के क़दमों की आवाज, के बावजूद सो जाता था.

गर्मियों की छुट्टियाँ बड़ी शीघ्रता से समाप्त हो गईं. भेड़ों ने बच्चे दे दिए थे, ज्यादातर उस समय में जब रिक्की फार्म पर पहुँचता था. वह फार्म के आसपास के चारागाह में और कोई भी घास का टुकड़ा जो वह झाड़ी घाटी पहाड़, जो फार्म के पीछे कुछ मीलों की दूरी पर स्थित था, के निकट पहाड़ की ढलान पर ढूंढ सकते थे, चरते थे. वहां बारह गायें थीं जिनका दूध दिन में दो बार निकालना पड़ता था. सिग्गी के पास 60 घोड़ों से ज्यादा का झुण्ड भी था, ज्यादातर घोड़ियाँ थीं जिन्हें गर्मियों में ऊँची जमीन के जंगलों में खुला छोड़ दिया गया था. उन्हें गर्मियों के मध्य अपने बछड़ों के साथ वापिस हांक लिया जाता था ताकि बछड़ों को चिन्हित किया जा सके, और यह हमेशा ही फार्म पर उत्तेजक समय होता था.

एक व्यक्ति जिसका नाम पीटर था, जो रिक्की के दादा का सबसे छोटा भाई था, भी फॉर्म पर रहता था. उसे बड़ी छोटी आयु में स्कारलेट बुखार हो गया था और वह कभी भी दस या ग्यारह वर्ष की उम्र से ज्यादा परिपक्व नहीं हो पाया था. उसके बहुत लम्बी दाढ़ी थी और सामान्यतया धारीदार कमीज को पुरानी गेलीस के साथ, जो पेंट को रोकती थी, पहनता था. वह एक खिन्न व्यक्ति था और कुछ सनकी था. वह गलियारे से भोजन कक्ष तक आगे पीछे चलते हुए, अपनी साँसों में बोलते हुए “गोल्डन वाटरफाल13 आज आया है”, घंटो बिता देता था. वह एक ऐसे संक्षिप्त समाचार का, जो मछली पकड़ने वाले जहाज और सामान ले जाने वाले जहाज के आने-जाने के बारे में था, जिसमें एक जहाज गोल्डन वाटरफाल नामक भी शामिल था, हवाला देते हुए प्रतीत होता था जो रेडियो पर प्रतिदिन प्रसारित होता था. फिर भी, कोई नहीं जानता था कि वह गोल्डन वाटर जहाज का हवाला ही क्यों देता था. शायद उस जहाज पर कोई ऐसा विशेष था जिससे वह मिलने की उम्मीद करता था, अपनी बीमारी के कारण अपने मस्तिष्क को खो देने से पहले: “कोई “ऐसा” जो कभी नहीं पहुंचा.

पीटर का मुख्य काम गायों की देखभाल करना था, जिसमें उन्हें खाना खिलाना और उनके

पीछे की नाली से गोबर उठाना था. यह एक वृद्ध व्यक्ति के लिये मेहनत का काम था, ख़ास कर उसके हर्निया के कारण. उस काम में पहले गोबर को एक एक पहिये के ठेले में डालना होता था और फिर उसे गोशाला के बाहर ले जा कर एक गड्ढे में डालना होता था. यह एक जोखिम भरा काम हो सकता था, क्योंकि ऐसे अवसर होते थे जब वह उनके पीछे की नाली को साफ़ कर रहा होता था तो गायों में से दो गाय, जिनके स्टाल गौशाला के आखिरी छोर पर थे, दस्त होने के कारण अपना मल वेग से सीधी दिशा में निकाल देते थे. पीटर, फिर भी, किसी भी दिन अपने काम से गैरहाजिर नहीं रहता था.

एक लड़की भी थी जिसका नाम डोरा था, जो रिक्की की बड़ी चचेरी बहन थी, और जिसे गर्मियों के महीनों में घर के काम करने के लिये रखा गया था. वह सत्तरह वर्ष की थी, उसके कन्धों तक भूरे बाल थे और उसका रंग गोरा था. उसका सुबह का नित्य का नियम नाश्ते को तैयार करने में सहायता करना था और यह निश्चित करना था कि सभी को नाश्ता मिल गया था और यह कि लड़कियों की जरूरतों की देखभाल करना. नाश्ता सामान्यतया स्क्यर (एक तरह की दही) का या दलिये का होता था. अगर पिछले दिन का कुछ बचा हुआ होता था, तो इन दोनों पकवानों को एक साथ मिला दिया जाता था जिससे एक मिश्रण14 बनता था जिसे, रिक्की के सिवा जो भी इसे निगलता था, यदि उसे खाने के लिये दिया जाता था तो, सभी उसे पसंद करते प्रतीत होते थे. चीजों को और ख़राब करने के लिये, कभी-कभी मसालेदार रक्त के हलवे की एक ठंडी फांक15 को इस मिश्रण के ऊपर अच्छी मात्रा में डाल दिया जाता था, इसे और भी बदबूदार बनाते हुए. नाश्ते के बाद, कुछ ताजा दूध, जिसे सुबह के दूध दोहने के बाद लाया जाता था, निप्पल वाली छोटी-छोटी बोतलों में डाला जाता था. उसके बाद बहुत हो-हल्ला होता था, क्योंकि आधा दर्जन भेड़ के बच्चों को,जिन्होंने बछड़े देने के मौसम अपनी माँ को खो दिया था, सामने के दरवाजे के बाहर बोतलों से दूध पिलाया जाता था.

डोरा अपने दिन के ज्यादातर समय को स्विचबोर्ड का संचालन करने में व्यतीत करती थी. स्विचबोर्ड में 101 प्लग थे जिसमें बहुत सारी तारें थीं जिन्हें उन फोन काल्स को, जो जिले के खेतों से देश के बाकी हिस्सों के लिये होती थीं, जोड़ने के लिये जल्दी-जल्दी खींच कर प्लग में लगाना पड़ता था. वह एक “पेशेवर” थी, और वह वहां एक हेडसेट के साथ, जिससे उसका सम्पर्क बाकी की दुनिया से होता था, घंटों बैठती थी. जिले के सारे फार्मों का एक अलग संकेत था, सामान्यतया मोर्स कूटसंकेत का एक अक्षर, जिसे वह दीवार पर लगे फोन बक्सों के पास लगे हत्थे को इस्तेमाल करके जल्दी-जल्दी घुमाते थे, जब वह फोन करते थे. और, क्योंकि सभी फार्म एक ही फोन लाइन से जुड़े हुए थे, वह एक दूसरे की विशिष्ट घंटी क्रम को सुन सकते थे. जब भी वह चाहें वह रिसीवर को उठा कर एक-दूसरे के फोन वार्तालाप को छिप कर सुन सकते थे. परन्तु, एक सधा हुआ कान हरेक फार्म से विशिष्ट “क्लिक” को पहचान सकता था, जो सुनी जा सकती थी जब रिसीवर को क्रेडल से उठाया जाता था. ये भी, कि फोन सम्पर्क की गुणवत्ता स्पष्ट रूप से घट जाती थी, उसके अनुपात में जितने लोग छुप कर फोन सुन रहे होते थे. जब सम्पर्क बहुत ही ख़राब हो जाता था, तो कोई शिष्टता से कहता था कि जो सुन रहे हैं कृपया अपने फोन को रख दें, ताकि दूसरी आवाज ढंग से सुनाई दे सके. उन अवसरों पर हरेक फॉर्म का विशिष्ट क्लिक फिर से सुना जा सकता था जैसे ही वो फोन रखते थे – बेशक, एक भी शब्द बिना बोले. कुछ अवसरों पर रिक्की ने अपनी माँ को फोन किया, वह केवल इंग्लिश में बात करता था, उसकी माँ की मातृभाषा, क्योंकि लम्बी दूरी के फोन महंगे होते थे. और, क्योंकि कोई भी उस भाषा को समझता नहीं था, हर कोई अपना फोन एक के बाद एक जल्दी-जल्दी रख देते थे, जिससे अच्छा सम्पर्क मिल जाता था.

रिक्की की चचेरी बहनें, जैसा कि छोटे बच्चे होते हैं, सुबह ऊंची और भारी आवाज में बोलते थे. उन सबके लम्बे बाल थे जिन्हें कंघी करना पड़ता था और चोटी बांधनी पड़ती थी. यह नित्य कर्म था जिसमें बड़ी लड़की के लिये आँसू भी शामिल थे, जिसके बाल विशेषकर पतले थे और उसकी निचली कमर तक पहुँचते थे और रात को आपस में उलझ जाते थे और हर सुबह उन्हें सुलझाना, कंघी करना और चोटी बांधना पड़ता था. रिक्की के सुझाव को, कि उसके बाल काट कर छोटे कर दिए जायें, नास्तिकता की हद तक माना गया और, निस्संदेह, उसके बारे में कभी सोचा नहीं गया.

रिक्की की सारी चचेरी बहनें गोरे रंग-रूप की थीं जबकि वह, उसकी माँ के अमेरिकन और मिश्रित जाति पृष्ठभूमि के कारण, सांवले रंग का था. डोरा और एलिन अक्सर फार्म की दक्षिणी दीवार के साथ धूप सेंकती थीं, जहाँ वह उत्तर-पश्चिमी हवा से, जो लगातार चलती थी, बच पाती थीं. उन्हें यह स्वीकार करने से गुस्सा आता था, लेकिन उनकी धूप से तपन लेने की कोशिशें अधिकतर बेकार ही होती थीं और उन्हें झुलसा देती थीं, जबकि रिक्की को लगभग एकदम से ही तपन मिल जाती लगती थी. ऐसा लगता था कि उसे केवल एक बार सूर्य की ओर देखने की आवश्यकता है, एक अच्छी तपन लेने के लिये. यह उन दोनों स्त्रियों के लिये पेचीदा था, क्योंकि उन्होंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था. तो, एक अवसर पर, यह सोचते हुए कि वह साधारणत: गन्दा होगा, उन्होंने उसके चेहरे और बाजुओं को तौलिये और साबुन से जोर-जोर से रगड़ा, सभी बिना किसी नतीजे के और उनकी हैरानी को बढ़ाते हुए. परन्तु, रिक्की की गहरे रंग की त्वचा उसे अलग और अकेला ही महसूस कराती थी, और वह उस परिवार का उतना हिस्सा नहीं था जितना कि उसे होना चाहये था.

हर सप्ताह, जैसे-जैसे सप्ताह समाप्त होने को आता था, डोरा थकी हुई लगने लगती थी. वह अपने पुरुष-मित्र, कार्ल, के आने का इंतजार करती रहती थी ताकि सप्ताहांत में उसे मनोरंजन के लिये कहीं ले जाये. शनिवार तक, बच्चों के साथ उसकी असहिष्णुता स्पष्ट हो जाती थी, और वह कार्ल से मिलने की अपनी प्रतीक्षा को बड़ी मुश्किल से रोक पाती थी. दोपहर के तीन बजे तक, रिक्की और उसकी तीनों चचेरी बहनें पहले से ही इंतजार कर रहे होते थे, बैठने वाले कमरे की खिड़की के साथ नाक दबाये हुए, मुख्य सड़क पर झांकते हुए आकर्षक वी-8 डॉज कोरोनेट के दिखाई पड़ने के लिये. लम्बे समय से पहले और सही पूर्वानुमान से, जैसे ही डॉज नजदीक आई धूल का एक बादल क्षितिज पर उभरा, जैसे कि बजरी की सड़क पर धूल के कोहरे में तैर रही हो. जितना की आँखें देख पा रही थीं, कार उससे भी ज्यादा गति से चल रही प्रतीत होती थी, जब तक यह फॉर्म की ओर आने वाले रास्ते पर पहुंचे, सड़क से और आगे. डोरा, अब इंतजार में अपने जूतों में कांपना शुरू हो गई थी, उसके गाल लाल हो रहे थे, उसकी आवाज आंठ्वे सुर से भी ऊपर जा चुकी थी, और उसके होंठ कार्ल को एक जोरदार चुम्बन देने के लिये तैयार थे, जैसे ही वह सामने के दरवाजे से आएगा. कार्ल कभी भी ज्यादा नहीं रुकता था, सभी को केवल नमस्ते कहता था, डोरा के साथ कार में दोबारा जाने से और धूल के बादल में ओझल होने से पहले, ह्वंस्तंगी, एक नजदीकी शहर, की ओर जाते हुए, जहाँ संभवत: वह एक मोटेल में चादर में रंगरलियाँ मनाने के लिये ठहरे थे, इससे पहले कि वह शहर में तूफानी रात बिताएं. और फिर यह हर सप्ताहांत को दोहराया जाता था, बच्चे खिड़की के नीचे की अलमारी से झुके, कार्ल की डॉज कोरोनेट को आसमान में जेट की तरह आने का इंतजार करते हुए, अपने पीछे धुंए की लकीर के छोड़ते हुए. वह एक छैल-छबीला आदमी था, उच्च फैशन के कपडे और नीली जीन्स पहने हुए. उसके घने काले बालों में बहुत सा बालों का जेल्ल लगा हुआ था, उसकी कलमें बहुत अच्छी थीं और उसकी मुस्कराहट एक शर्मीली एल्विस की तरह थी. और डोरा, कान से कान तक मुस्कराते हुए, आँखों में एक जगमगाहट के साथ, तंग मिनी-स्कर्ट पहने हुए, और उसके साथ की रूपरेखा वाला ब्लाउज, और बुद्धिमानी से ऊँची एड़ी वाले सैंडल(क्योंकि वह एक “बुद्धिमान” तरह की लड़की थी), उसकी गाड़ी में बैठ गई, अपने जूडे को ठीक किया, और अपना श्रृंगार देखा, इससे पहले कि वह बच्चों की इर्शालू आँखों को अलविदा कहती, जब वह गाड़ी में बैठ कर कार्ल के साथ जाती थी. रिक्की और लडकियों को ऐसा लगता था कि उनके पास किसी भी रोमांचक जगह पर जाने के लिये नहीं था.

दूसरे मामलों में, फार्म का जीवन रिक्की के लिये आँखे खोलने वाला था. कुछ ऐसी घटनाएँ जिन्हें समझ पाना रिक्की के लिये मुश्किल था और उन्होंने उसे स्तंभित कर दिया था. एक लड़का, जिसका नाम गुन्नार था, और जो किशोरावस्था के अंतिम चरण में था, फार्म पर रहता था; वह एलिन की पिछली शादी से उसका बेटा था. गुन्नार ह्रदय की एक ऐसी स्थिति में था कि जल्दी ही थक जाता था. उसके पास एक राइफल थी, और निशाना लगाने के अतिरिक्त, उसे व्हिमब्रेलों16 और सामान्य चाहा17 का शिकार करने में आनंद आता था, यद्दपि ये लुप्तप्राय: जातियां थीं. रिक्की कई बार उसके साथ इस गुप्त “रोमांचक खेल” पर गया और देखा कि वह कभी-कभी उन चिड़ियों को, जिन पर वह गोली चलता था, केवल घायल ही कर पाता था. वह फिर जा कर उन्हें फड़फड़ाते हुए पकड़ कर उनका सिर काट कर उन्हें उनके कष्ट से मुक्त कर देता था - जिस कृत्य को वह कहता था कि उन्हें उनकी पीड़ा से मुक्ति दिलाने के मजबूरन करना पड़ता था. इसे देख कर रिक्की बहुत भयातुर हो जाता था और उसे बड़ी घबराहट होती थी, लेकिन उसने इसके बारे में किसी को न बताने की कसम खाई थी, इसलिये उसने इसे एक राज ही रखा.

गुन्नार का एक कुत्ता, जिसका नाम कोलुर था, भी था जो बूढ़ा था और उसे गठिया था और उसे मारना पड़ा था. परन्तु, गुन्नार ने किसी और को यह कार्य नहीं दिया, यह दावा करते हुए कि कुत्ते के प्यार करने वाले स्वामी होने के कारण यह उसका कर्तव्य था कि वह उसे गोली मारे. इस कार्य को करने से दुखी, उसने फिर भी निश्चय किया कि वह इसे करेगा और फिर बाद में रोया. यह रिक्की की समझ के बाहर था. इन घटनाओं के बाद रिक्की गुन्नार से दूर रहने लगा. उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी चीज थी जो अनुपस्थित थी, एक अनुपस्थित पेंच जिसका सम्बन्ध, निस्संदेह, दया से था.


फार्म, लक्जमोट.(फोटोग्राफर:विग्दिस कार्ल्सदोत्तिर)

यह समझ में आता है, फार्म पर जानवरों को मारा भी जाता था जिनके भाग्य में यह लिखा था कि फार्म के लोगों का भोजन बनें, और, जबकि यह अशांति फ़ैलाने वाला था और चूजों को कटे हुए सिरों के साथ इधर-उधर भागते हुए देखना निर्दयता थी, और बछड़े, भेड़, यदा-कदा घोड़े को खाने के लिये काटना, रिक्की समझ गया कि यह चीजें सामान्य हैं. उन्होंने हालांकि उसे कठोर बनाने में सहायता की, और वह जल्दी बड़ा हो गया.

             [क्रमशः........(अगले अंक में पढ़ें रिक्की का बौनों के देश का अनुभव)]

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