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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

अखबार

महेन्द्र देवांगन "माटी"

सुबह सुबह हर रोज के, आता है अखबार । चुस्की लेते चाय की, पढ़ते बाबा द्वार ।। ताजा ताजा रोज के, खबरों का भंडार । बच्चे बूढ़े प्रेम से, पढ़ते हैं अखबार ।। सभी खबर छपते यहाँ, अलग अलग हैं पृष्ठ । शब्दों का भंडार हैं, कहीं सरल तो क्लिस्ट ।। फैल रहा है विश्व में, कोरोना का रोग । बता रहे अखबार में, कैसे जीयें लोग ।। कोई देखे चित्र को, कोई देखे खेल । कोई देखे भाव को, कोई देखे रेल ।।

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