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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



दूसरों की कमाई , हमें क्यों बताते हो भाई ....!!


तारकेश कुमार ओझा


उस विवादास्पद अभिनेता पर बनी फिल्म की चर्चा चैनलों पर शुरू होते ही मुझे अंदाजा हो गया कि अगले दो एक - महीने हमें किसी न किसी बहाने से इस फिल्म और इससे जुड़े लोगों की घुट्टी लगातार पिलाई जाती रहेगी। हुआ भी काफी कुछ वैसा ही। कभी खांसी के सिरप तो कभी किसी दूसरी चीज के प्रचार के साथ फिल्म का प्रचार भी किया जाता रहा। बात इतनी तक ही सीमित कहां रहने वाली थी। फिल्म के रिलीज की तारीख नजदीक आने के साथ ही इसकी चर्चा खबरों में भी प्रमुखता से होने लगी थी। प्राइम टाइम पर फिल्म को इतना कवरेज दिया जाने लगा कि लगा मानो देश में बाढ़ - सूखा , गरीबी - बेरोजगारी और आतंकवाद जैसी समस्या पर भी यह फिल्म भारी है। जिसकी प्राइम टाइम पर चर्चा करना बेहद जरूरी है। वर्ना देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा। उस अभिनेता की फिल्म के चलते जो खुद स्वीकार करता है... मैं बेवड़ा हूं... अमुक हूं ... तमुक हूं... लेकिन आतंकवादी नहीं हूं...। वह खुद कहता है मैं शारीरिक सुख के मामले में तिहरा शतक लगा चुका हूं। मन में सवाल उठा कि आधुनिक भारत के क्या अब यही आदर्श हैं। फिर जवाब मिला यह अभिनेता ही क्यों... तुरत - फुरत एक दूसरे फिल्म निर्माता ने नग्नता के लिए बदनाम अभिनेत्री की जीवनी पर भी बायोपिक फिल्म की घोषणा कर दी है। अभी पता नहीं ऐसे कितने विवादास्पद शख्सियत पर फिल्म बनती रहेगी। बॉलीवुड फिल्में बनाने को पागल है... बस कमाई होती रहनी चाहिए। खैर धीरे - धीरे समय नजदीक आता गया और फिल्म रिलीज हो गई। इसका अभ्यस्त होने के चलते संभावित घटनाएं मेरी आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह ही नाचने लगी। चैनलों से पता चला कि पहले ही दिन फिल्म ने कमाई के मामले में पुराने सारे रिकार्ड तोड़ डाले। जिसे देख कर एक बारगी तो यही लगा कि क्रिकेट से ज्यादा रिकार्ड अब वॉलीवुड में टूटने लगे हैं। आज इस फिल्म ने रिकार्ड तोड़ा कल को किसी बड़े बैनर की कोई नई फिल्म रिलीज होगी और फिर वह पुराने वाले का रिकार्ड तोड़ देगी। कुल मिला कर क्रिकेट के बाद देश को फिल्म के तौर पर एक ऐसा जरिया जरूर मिल गया है जहां हमेशा पुराने रिकार्ड टूटते हैं और नए बनते रहते हैं। बहरहाल चर्चा में बनी फिल्म के महासफल होने की घोषणा कर दी गई । फिर क्या था... बात - बात पर पार्टी लेने - देने वालों ने इसी खुशी में पार्टी दे डाली। जिसमें एक से बढ़ कर एक चमकते चेहरे नजर आए। जिसे दिखा कर चैनल वाले दर्शकों का जीवन सफल करने पर तुले थे। जिस मुंबई में यह सब हो रहा था, उसी मुंबई की पहली बारिश से हालत खराब थी। चैनलों पर इसकी भी चर्चा हुई लेकिन उतनी नहीं जितनी फिल्म की। पता नहीं देश को यह बीमारी कब से लगी। जो दूसरों की कमाई की व्यापक चर्चा करना चलन बनता चला गया। कभी किसी क्रिकेटर तो कभी किसी अभिनेता और कोई नहीं मिला तो किसी फिल्म की कमाई का ही बखान जब - तब शुरू हो जाता है। जबकि हमारे बुजुर्ग पहले ही औरत की उम्र और मर्द की कमाई की चर्चा नहीं करने की सख्त हिदायत नई पीढ़ी को दे गए हैं। लेकिन हमे हमेशा कभी किसी क्रिकेटर तो कभी किसी फिल्म या उसके अभिनेता की करोड़ों - अरबों की कमाई की घुट्टी देशवासियों को जबरन पिलाई जाती है। उस दर्शक को जो बेचारा मोबाइल का रिचार्ज कराने को भी मोहताज है। मेरी नजर में यह एक तरह की हिंसा है। जैसे छप्पन भोग खाने वाला कोई शख्स भूखे - नंगों को दिखा - दिखा कर सुस्वादु भोजन का आनंद ले। ऐसा हमने गरीब बस्तियों में देखा है। जो अमीरों की शाही शादियों को ललचा कर देखते हैं और आपस में इस पर लंबी बातचीत कर अपने मन को तसल्ली देते हैं कि फलां सेठ के बेटे की शादी में यह - यह पकवान बना और खाया - खिलाया गया। इसी तरह जो जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए 16 - 16 घंटे जद्दोजहद करने को मजबूर हैं । इसके बावजूद भी तमाम तरह की लानत - मलानत झेलने को अभिशप्त हैं उन्हें रुपहले पर्दे के सितारों की कमाई की बात बता कर कोई किसी का भला नहीं कर रहा। बल्कि समाज में एक भयानक कुंठा को जन्म देने पर तुला है।


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