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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



तुम्हें पुकारेंगें हम


सुशी सक्सेना


                         
अपने ख्यालों के साथ तन्हाई में वक्त गुजारेंगे हम,
खुद को बेकरार करेंगे और खुद ही संभालेंगे हम।

आज लफ़्ज़ों के साथ मेरी बात बन ही गई है,
गजल बन जायेगी जब कागज़ पे उन्हें उतारेंगे हम।

पीतल को मांजने से सोने सा चमक जाता है वो,
हम भी कुछ खास दिखेंगे जब खुद को संवारेंगे हम।

हजारों फूल डाली से टूट कर राहों में गिर पड़ेंगे,
साथ साथ चलने के लिए जब जब तुम्हें पुकारेंगें हम।

आराम दिल को जो मिलेगा वो मय से भी न मिलेगा,
आंखों के रास्ते से जब दर्द को बाहर निकालेंगे हम।

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