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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



उनके हाथों लुटने से गुरेज़ नहीं


डॉ० अनिल चड्डा


 
उनके हाथों लुटने से गुरेज़ नहीं,
प्यार में तो ये हैरतअंगेज नहीं।

बेवफाई उनकी फितरत ही सही,
हमें वफ़ा करने से परहेज नहीं। 

वो ग़मों का तोहफा साथ में लाये,
हमने सुना कभी ऐसा दहेज नहीं।

कोशिश तो थी कि हिन्दुस्तानी बनें,
मन से निकला मगर अंग्रेज नहीं।

दिल की बात लबों पर आने दे ‘अनिल’,
तूफां को जबरदस्ती सहेज नहीं।
 

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