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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



गीतों के राजकुमार :- पद्म श्री गोपाल दास नीरज
पुण्य तिथि:- 19 जुलाई 2018


राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"


हिंदी कवि सम्मेलनों से प्रसिद्धि पाने वाले हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार,कवि लेखक, गोपाल दास नीरज का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन गुरुवार 19 जुलाई 2018 को हुआ। मंगलवार को उन्हें आगरा के लोटस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। वहाँ से उन्हें दिल्ली ले जाया गया । जहाँ उनका निधन हुआ। यह खबर आते ही सोशल मीडिया पर कवियों ने पढ़ा तो अवाक रह गए। हिंदी साहित्यकार के लिए आज रुदन का दिन हो गया। हिंदी साहित्य का सूरज डूब गया। उनके लिखे गीत अमर हो गए। कारंवा गुजर गया गुबार देखते रहे। आज भी लोग सुनते हैं। गीत ऋषि का यूँ चले जाने से सिने जगत व हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों में उदासी छा गई। 93 वर्ष की आयु में उनका निधन के समाचार सुना तो स्तब्ध रह गए।

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है। अब तो मजहब ऐसा बनाया जाए जिसमे आदमी को आदमी बनाया जाए।

नीरज जी की लिखी ये रचना अमर हो गई। नीरज जी की रूह को करोड़ो सलाम।

नीरज जी का नाम गोपाल दास सक्सेना था। हिंदी साहित्य का लेखन इन्होंने नीरज उपनाम से किया था। 4 जनवरी 1925 को इनका जन्म पुरावली इटावा उत्तर प्रदेश में हुआ था। हिंदी कवि सम्मेलनों के लिए ये प्रसिद्ध हुए।

6 वर्ष की उम्र में इनके पिता का निधन हो गया था। घर का सारा खर्च चलाना इन पर आ गया था। संघर्षमय जीवन रहा। इन्होंने 1949 में इंटरमीडिएट 1951 में स्नातक 1953 में स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन्होंने घर की जमीन बेचकर नोकरी में भाग्य आजमाया। इटावा में न्यायालय में टाइपिंग का कार्य किया।1942 में दिल्ली आए। दिल्ली में नोकरी का प्रयास किया। दिल्ली में सप्लाई विभाग में टाइपिस्ट बने। उन्हें 67 रुपये मासिक वेतन उस समय मिलता। जिसमें से 40 रुपये उन्हें घर भिजवाना पड़ता था। मात्र 27 रुपये में वे दिल्ली में खर्च चलाते। 40 रुपये में घर व भाइयों की शिक्षा में खर्च हो जाते। नीरज ने कई नोकरियों को किया। कानपुर में क्लर्क रहे।

नीरज जी ने एक टाइम ही खाना खाया। वे तला खाते थे। जिससे वह देरी से पचता था। ऐसे पेट काटकर नीरज ने संघर्षमय जीवन जिया। 1955 में प्राध्यापक बने। वहाँ उन पर सहयोगी कर्मचारियों ने झूंठे आक्षेप लगा दिए। उन्होंने नोकरी छोड़ दी। दोबारा प्राध्यापक बने। आरोप गलत साबित हुए। नीरज ने आत्मसम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करते हुए दुबारा नोकरी पर नहीं गए।

नीरज की प्रमुख कृतियाँ जो काफी लोकप्रिय हुई उनमें है:-

दर्द दिया है आसावरी प्राण गीत गीत जो गाए नहीं बादल बरस गयो दो गीत नदी किनारे नीरज की गीतिकाएँ नीरज की पाती लहर पुकारे मुक्तकी गीत अगीत विभावरी संघर्ष अंतर्ध्वनि बादलों से सलाम लेता हूँ कुछ दोहे नीरज के कारवां गुजर गया।

नीरज ने वॉलीवुड में कई फिल्मों के पांच सालों में गीत लिखे। उनकी पहली फ़िल्म कारवां गुजर गया थी। 70 सालों तक कविता गीतों का सृजन किया। अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में नीरज को सुनने के लिए श्रोता बैठे रहते थे। 1970 में फ़िल्म चन्दा और बिजली में फालका पहिया घूमे रे भैया गीत लिखा। 1971 में फ़िल्म पहचान में बस यही अपराध में हर बार करता हूँ गीत लिखा। 1972 में फ़िल्म जोकर में ए भाई जरा देख के चलो गीत लिखा। तीनों फिल्में सुपर हिट हुई। माया नगरी में नीरज छा गए। उत्तर प्रदेश के नीरज ने बॉम्बे में अपनी पहचान बनाई। लेकिन मुम्बई में उनका मन पांच सालों के बाद नहीं लगा।

मुम्बई से नीरज अलीगढ़ आ गए। लखनऊ में काव्य गोष्ठियां की। नीरज हरिवंशराय बच्चन साहब से प्रभावित हुए। बच्चन की रचना निशा निमंत्रण पढ़ी तो उन्हें भी वहां से कविता लिखने की प्रेरणा मिली। उनकी फिल्में कारवां गुजर गया शर्मीली मेरा नाम जोकर पहचान चन्दा ओर बिजली से नई पहचान मिली। दुनिया 1968,पतंगा1971,मझली दीदी 1967 में फ़िल्म प्रसिद्ध हुई।

नीरज ने कई दोहे लिखे । उनके दो दोहे देखिए:- दीपक तो जलता यहां सिर्फ एक ही बार। दिल लेकिन वो चीज़ है जले हज़ारों बार।। जीवन पीछे को नहीं आगे बढ़ता नित्य। नहीं पुरातन से कभी सजे नया साहित्य।।

1991 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म श्री,1994 में यश भारती उत्तर प्रदेश सरकार ने,2007 में पदम भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें तीन बार फ़िल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया।

नीरज ने कहा था" अगर दुनियां से रुखसती के वक्त आपके गीत व कविताएँ लोगो की जबान और दिल मे हो तो यही आपकी सबसे बड़ी पहचान होगी।


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