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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



अपने अपने दायरे


विजयानंद विजय


अचानक उसके ह्वाट्सएप पर एक वीडियो मैसेज आता है...सुरभि के नं. से। वह उसे डाउनलोड करने लगता है। तभी दूसरा मैसेज आता है..... " सॉरी। "

वह तुरंत डाउनलोडिंग बंद कर देता है, और मैसेज टाईप करता है - " वीडियो इज नॉट रेस्पांडिंग। "

जवाब में फिर एक मैसेज...इमोजी के साथ.... " ओ के। थैंक्स। "

व्यतीत सहसा उसकी आँखों में उतर आता है.....कॉलेज के दिन...लाइब्रेरी में अक्सर होती मुलाकातें...। साहचर्य का कोमल - मधुर एहसास और...मौन अभिव्यक्ति ! पढ़ाई, प्रैक्टिकल्स, एसाइनमेेंट, परीक्षाएँ, टूर...। संग-साथ के बीतते खुशनुमा पल। और, फिर परंपराओं, जाति-धर्म की सामाजिक संकीर्णताओं की सूली पर चढ़ता उनका निश्छल प्रेेेम ! समय और स्थान की लंबी.....और लंबी होती जाती दूरियाँ !

लम्हा-दर-लम्हा बीतते पाँच वर्ष, सब कुछ भूल जाने की कोशिश में...। फिर, उस दिन अचानक एक मित्र के घर वैवाहिक कार्यक्रम में जब सुरभि और उसके पति से मुलाकात होती है, तो एहसास एक बार फिर से जी उठते हैं।

और आज, एक हफ्ते बाद ह्वाट्सएप पर अचानक उसका वीडियो मैसेज....! फिर अचानक..... " सॉरी !"

वह सोचने लगता है....शायद मन अव्यक्त रहकर भी कुछ व्यक्त करना चाह रहा हो ! शायद कुछ कहना शेष हो !

फिर वह सिर झटक देता है.....नहीं।नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।सुुरभि कभी इतनी कमजोर नहीं हो सकती। सात जन्मों के बंधन से बँधा पवित्र रिश्ता और अटल विश्वास....।पाँव ठिठक जाते हैं, और सुरभि " सॉरी " बोल पड़ती है।

वह उस वीडियो से झाँकती धुंधली-सी छवि को ध्यान से देखने की कोशिश करता है....वहाँ आकृतियाँ हैं पार्क की बेंच पर बैठे दो युवा प्रेमियों की.... एक-दूसरे को गुलाल लगाते हुए !

वह मुस्कुराता है। एक क्षण को रुकता है। फिर वीडियो डिलीट कर देता है।और...ठंडी सांसें भरते हुए पुन: अपने एकाकीपन में लौट जाता है....।


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