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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



श्रद्धा


वर्षा वार्ष्णेय


हेलो ,दीपाजी वो अगले हफ्ते जो कार्यक्रम होना था किसी वजह से केंसिल हो गया है ।आप चिंता न करें अगले महीने जब भी कार्यक्रम होगा हम आपको जरूर बुलाएंगे ".........फ़ोन की घंटी बजते ही दीपा को एक झटका लगा । कुछ देर रुककर उसने कहा 'कोई बात नहीं ,लेकिन ये क्या अभी फोन कटा नहीं था ।दीपा ध्यान से उनकी बातें सुनने लगी । "वो लड़की जवान है ,शुक्र है 8 से 10 हजार में मान गयी ।"

ये सुनकर जैसे दीपा आसमान से धरातल पर आ गयी ।गहन मुद्रा में बैठकर सोचने लगी क्या कवि सम्मेलन भी आज सिर्फ एक व्यापार बन चुका है । शुक्र है ईश्वर का उसने उसे समय रहते इस दलदल से बच लिया । उसकी आंखों में खुशी के आँसूं और दिल में एक बार फिर से ईश्वर के लिए अपार श्रद्धा उमड़ने लगी । ईश्वर का शुक्रिया अदा करना था या अपने आंसुओं को रोकना ,उसके कदम बरबस मंदिर की ओर मुड़ गए ।


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