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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



ओल्ड इज गोल्ड


धनेन्द्र प्रवाही


अत्याधुनिक फैशन वाले लिबास में वह ड्रेसिंग रूम से निकली तो सबकी निगाहें उस पर अटक सी गयीं. उसे खुद पर गर्व हो आया. इस बार ‘मिस-रांची’ का ताज उसी के सिर पर सजेगा. साबित हो जायेगा कि गाँव-देहात की लड़कियां भी शहरी लड़कियों से कम नहीं हैं. पहले कभी एक बार वह दुकान में गयी थी तो किसी ने उस पर ध्यान तक नहीं दिया था. इसका कारण उसे अपना आउटडेटेड ड्रेस लगा था. इस बार उसने झुमके बेचकर कीमती परिधान खरीद लिए. फैशन के नए बाजार में पुराने जेवरात की पूछ भी क्या है! इसीलिए एकदम आधुनिक पहरावे और नए ढंग के नकली गहनों में सजकर उसने लोगों की प्रशंसा बटोरी. ‘मिस-रांची’ बनने के सुनहले सपनों में और कुछ दिन गुजर गए. प्रतियोगिता की पूर्वसंध्या पर वह शहर के उसी नामी परिधान विक्रेता के यहाँ फिर गयी. उस दिन सौन्दर्य विशेषज्ञों ने उसके पहरावे को आउट-ऑफ़-ट्रेंड कह कर नयी डिजाईन के दुसरे कपडे पहनने की सलाह दे दी. नयी काट के उन कीमती कपड़ों को खरीदना अब उसके बूते की बात नहीं थी. कोई उपाय नहीं देखकर उसने तय कर लिया कि अब वह प्रतियोगिता में भाग नहीं लेगी. ठीक समय पर प्रतियोगिता के परिणाम आये. उसने अख़बारों में छपे फोटोग्राफ में देखा कि ‘मिस-रांची’ का ताज पहनने वाली लड़की एक देहाती बाला के मामूली पहरावे में थी. उसके कणों में झुमके झूल रहे थे. ये वही पुरानी डिजाईन वाले झुमके थे जिन्हें उसने पिछले दिनों पुराने जेवरात कहकर बेच दिया था.


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