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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



पर्वतों के पार


उत्तम टेकडीवाल


    
पर्वतों के पार
और कई पर्वत हैं
ऊँचाईयों को समेटे हुए
उन सब अनुभवों का 
साकार रूप बन कर
पाशाण हो जाते हैं जो
भावहीन, दृढ, अटल
वो सारी ऊर्ध्वमुखी ऊर्जा 
करती है निर्माण 
नये आयामों का
जो चमकते हैं धवल
आकाश के मुकुट पर
उज्जवल प्रेरणास्रोत वह
निर्मल धारा का रूप लेकर
बहता है उन पर्वतों को चीर कर
समर्पण की शक्ति से
पाशाणों को मिट्टी बना
उर्वर उस जमीन का निर्माण करता है
जहाँ खुशहाल सभ्यता लहलहाती है।
समर्पण की समतल घाटी में
उन उर्ध्वमुखी पर्वतों का प्रतिबिंब;
उँचाईयों का गहराईयों में विलीन होना
जीवन की छवि को पूर्ण करती है।
 

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