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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



अति


सुशी सक्सेना


                         
अति की बरखा, अति का सूखा,
अति न किसी की भाये |
अति की आँधी जब चल जाये,
तो प्रलय दुनिया मे आ जाये |
अति की बोली, अति का मौन,
अति की भाषा समझे कौन |
पत्थर के भी टुकड़े हो जाते हैं,
जब मार अति की बो खाये |
अति का कृोध, अति का सहना,
अच्छा न लगे अति का हंसना |
नसूर बन जाते है इक दिन वे भी
अति के आँसू जो पीते जाये |
अति का भला, अति का बुरा,
अति की चाह न किसी को भाये |
सगे सगे भी दुश्मन बन जाते हैं,
अति की नफरत जो दिल मे बस जाये |
अति का रूप, अति कुरूप,
अति की दौलत पागल कर जाये |
भूखा मरे जो अति गरीब हो,
अति न किसी की भाये |
अति की उलझन, अति का सुकून
दिवाना बना दे अति का जुनून |
अति का जमघट, अति का वीराना,
ऐसे मे साँस चैन की को ले पाये |

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