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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



वहम


रामदयाल रोहज


                         
इस वहम वहम के चक्कर ने 
शमशान घरों को बना दिया 
गंगा से पावन रिश्तों को 
पल भर में घायल बना दिया 
खिंच जाती भीत भाईयों मध्य
वो प्यार धूल में मिला दिया
मां बाबा के उन वचनों को
अब जानबूझकर भुला दिया 
अब अनदेखे ही देखो तो 
पत्नी पर लाछन लगा दिया
करके प्रहार कुल्हाड़े का
लम्बी निन्द्रा में सुला दिया 
होती घर में तू तू मैं मैं 
मित्रों को दुश्मन बना दिया
सुख बैठा कोसों दूर डरा
घर में पावक सा लगा दिया
   

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