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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



आनन्दमय


रामदयाल रोहज


                         
रावतसर बस स्टैंड पर  
मैं बैठा था बस के इंतजार में
उफ! इतनी भयंकर गरमी 
सोचा जरा जूस पी लूं 
मैं जूस पी ही रहा था कि 
एक आठ नौ साल की बच्ची
फटे पुराने वस्त्र 
पसीना उसके दर्द में
आग में घी का काम कर रहा 
सूखे पपड़ी  पड़े ओष्ट
पास आकर बोली अंकलजी
पाँच रुपये दे दो 
मैंने उसे ललकारते हुए कहा
पैसा मांगते शर्म नही आती
तुम्हारे बाप से लो
बच्ची का पानी उतर गया 
अंकलजी ! बाप तो शराबी है 
मां को कई साल बीत गये 
और उसका गला भर आया 
आज सुबह से एक अन्न का दाना भी
मुँह में नही डाला 
सुबह से अब तक सिर्फ मिली झिड़कियाँ 
मैंने उसके चेहरे को पढा 
जिस पर लिखे शब्द थे
उनके कहने के अनुरूप 
दया ने निर्दयता को पश्त करते कहा
बेटी क्या खाओगी ? कुरकुरे 
जब बच्ची अपनी भूख शान्त कर रही थी
मैं देखता रहा उसे लगातार 
बच्ची ने प्रसन्नमुद्रा में मुझको देखा
जैसे मुझे स्वर्ग से बड़ा सुख मिला हो 
जैसे मैंने तीर्थ कर लिया हो 
जैसे किसी देवी ने मेरा प्रसाद गृहण किया  हो और अब मुझे 
आशीर्वाद दे रही हो 
सचमुच मेरा मन था आनन्दमय |
   

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