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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



अहा! ज़िंदगी


पवन अनाम


 
कभी तारों से सजी रात मिलती है। 
कभी आंसुओ की लड़ियों सी सौगात मिलती हैं।
ज़िक्र करता हूँ जब तेरा 
मैं कागज़ से,
स्याही की बूंदों के साथ पानी
की बरसात मिलती हैं।
कहीं गैरों में भी अपनों का अक्ष नजर आता हैं
कहीं अपनों में भी परायों की जात मिलती हैं।
जी रहे हैं तुझको 
यह सोचकर 
और कहाँ कदरदानों की 
बारात मिलती हैं?
मजा आ रहा है 
कहीं दहकते शोलों का बादल है
तो कहीं चाहने वालों की ज़मात मिलती हैं।
और क्या चाहिए
तुझसे ए_ज़िंदगी
हर रोज़ अख़बार में 
हमारी क़लम की बात मिलती हैं।		 
 

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