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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



प्रेम का नाता जोड़ो


महेन्द्र देवांगन माटी


 
ढूँढ रहे सब इधर उधर, सुख कैसे आ पायेगा ।
भटक गया है राह मानव , दुख कैसे अब जायेगा ।
बीत गया है पूरा जीवन, पद पैसे की चाह में ।
अब अफसोस क्या होगा, अंधी दौड़ की राह में ।
माया की लालच में फंसकर, रिश्ते नाते भूल गये ।
आंख खुली तो पता चला , घर परिवार दूर गये ।
किस लालच में फंसकर तूने, इतना धन कमाया है ।
साथ दिया न कोई नाता, जब मुसीबत आया है ।
संभल जाओ अब वक्त रहते, माया का लालच छोड़ो ।
घुल मिलकर रहना सीखो , सबसे प्रेम का नाता जोड़ो ।		 
 

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