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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



प्रकाश


लवनीत मिश्र


 
रूदन करे,विलाप करे,
करे धरा संताप,
है ब्रहमा,है परमपिता, 
मै धरा रही हूँ कांप, 
स्मरण करे ब्रहमा उनहें,
जो जग के पालनहार, 
नासिका से ब्रहम के,
प्रकटे तब तारणहार, 
वरनन उनकी क्या करूँ, 
अदभुत रूप बनाए,
अति विकराल देह धर,
वराह रूप दिखाए,
थूथन पर तब श्री हरि,
जलमग्न धरा बचाए,
हिरण्याक्ष दानव को,
दिए स्वर्ग पटाए। 
 

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