Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



माँ शारदे दया करो


लक्ष्मी नारायण गुप्ता


ललित अलंकरण सुगठित छंद
मोहक गण लय की सरिता
कष्ट भुलाकर सुख देती
अंत: से निसृत हर कविता
संवेदन शून्य हुआ मानव
मन व्याकुल, संताप हरो
माँ शारदे दया करो ।

सब कुछ है हरिताभ यहाँ
किंतु, साधक निपट अकेला
भावुकपन की उथल पुथल
पग पग पैदा करे झमेला
तम में डूब रहे हैं अंत:
मन व्याकुल, संताप हरो
माँ शारदे दया करो ।

बुद्धि वैभव मन भटकाये
मैं अंत: सुख का अनुरागी
लोकेषण से दूर रहूँ
मैं फकीर सा बैरागी
कवि धर्म से जुड़-रमने को
मन व्याकुल, संताप हरो
माँ शारदे दया करो ।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें