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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



कब आओगे??


कंचन अपराजिता


है प्रतिक्षित चक्षु प्रियवर कब आओगे ,
मन मासूम सा किलकता कब आओगे,
रूठी किस्मत सूनी राहे तकती है निशदिन,
मिलन की अमृत घूँट पिलाने कब आओगे।

तप्त धूप मे कुम्हला रहा कोमल तन है,
विरह वेदना को पी जा रहा आर्त मन है,
बंजारा सा भटकता है ये ख्यालों के कुंज में,
मनुज देख कर कहता यही जीवन है।

आ जाओ कि पुष्प का यौवन ढ़लने चला,
पंरिदे ने भी मोड़ दी उड़ाने गृह ओर चला,
गले मिलने को आतुर बेबस प्रति क्षण है,
उम्मीदों के चिराग आँधियों मे घिरने चला।

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