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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



जीने का अधिकार
( पेड़ की विनय )


कमला घटाऔरा


 
देदो थोड़ी-सी धरा 
बस थोड़ा सा प्यार
और नहीं चाहता कुछ
चाहता हूँ जीने का अधिकार ।

लुटा पुटा भटक रहा हूँ
अपनी जन्मभूमि वनस्थली से 
बिछुड़े संगी साथी सब 
बिखर गया सारा परिवार ।
कोई तो खोलो पनाह -द्वार ।

अकरूण क्यों हुआ मानव तू 
काट काट फेंक रहा 
धड़ औ’  गर्दने हमारी 
अपने हाथों उजाड़ रहा संसार ।
वक्त है, करलो भूल सुधार ।

कोई तो सुनो विनय मेरी 
लगा लो आँगन के कोने में 
या खेतों की मेड़ों पर
दूँगा शुद्ध हवा का भंडार ।
करो इतना सा उपकार ।

नहीं दे पाया फल या फूल
हरे हरे पत्तों से कर श्रृंगार
महकाऊँगा घर आँगन सारा 
ग्रीष्म में बनूंगा छाता छायादार  ।
सोचो , करो  जरा विचार  ।

मत बनो निर्मम इतने 
सदियों से  है साथ हमारा
मुझ से हो तुम ,तुम से  हूँ मैं 
दो न तुम ऐसे दुतकार ।
देदो ,जीने का अधिकार ।
 

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