Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



असलियत को जाना होता


कामनी गुप्ता


 
काश ! असलियत को कभी तुमने जाना होता।
गुस्से में छुपे प्यार को भी तुमने पहचाना होता।

मां बाप ज़िंदगी में हमारी अनमोल हुआ करते हैं
उनकी सख्ती को बेवजह न तुमने माना होता।

लफ्ज़ों को तुम तोलते रहे बरसों तलक मगर
उनकी हसरतें पूरी करने का कभी तो ठाना होता।

बदले में प्यार के कभी प्यार तुमसे मांगा तो नहीं
हुए बड़े पर कभी उनकी गली भी तो आना होता।

जान जाओगे फिर इक दिन दर्द को उनके इह तरह
जब तुम्हारे बच्चों को भी तुमसे मिले ज़माना होता।।।

 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें