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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



मलहम मिले घाव पर


हरिहर झा


 
सूरज की 
कोमल कोमल  किरणे 
छा जाती,  तनाव पर 
चिंता के काँटों से  भी  कलियाँ,   
बिखरती पहनाव पर 

प्रवाह में, 
गहरी साजिश  के  
सोच समझ डूब चली  
जादू  जिजीविषा का, डूबे,  
पर, तिनके की  खूब चली

लहर दिशा की 
चक्रवात में  
भारी किसी चुनाव पर
बचना था, 
टूटा, भले समंदर  
छेद वाली नाव पर।  

परिवार बचाये कैसे? करना  
ठन्डी पेट की आग 
सिर पर दुनिया का बोझ उठाया,
हो लज्जित शेष नाग 

ओले, 
गरीब की खोपड़िया के 
कच्चे से  बुनाव पर 
उष्मा भी पीड़ा देना चाहे,  
मलहम मिले  घाव पर।  
 

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